न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ १० ] फल, दुःख तथा अपवर्ग। इनमें 'आत्मा' मन तथा शरीर से भिन्न है। ('न्यायदर्शन' का लक्ष्य इस आत्मा को शरीर, इन्द्रिय तथा उनके विषयों के बन्धन से मुक्त कराना है।) 'शरीर' का निर्माण पृथ्वीप्रधान होता है। 'मन' अणु, सूक्ष्म तथा नित्य है; यह आत्मा के लिये सुख, दुःख आदि गुणों के अनुभव के लिए एक निमित्त है। यद्यपि अक्षपाद ने मन का इन्द्रियत्व स्वोक्त्या सिद्ध नहीं किया, परन्तु 'समानतन्त्रसिद्धान्त' से उसको 'अन्तरिन्द्रिय' माना है। जब आत्मा का मन तथा इन्द्रियों द्वारा किसी वस्तु से सम्बन्ध होता है तो उसे एक सुखानुभूति होती है, यह सुखानुभूति आत्मा का नित्य गुण नहीं है। जब मन तथा इन्द्रियों द्वारा किसी वस्तु से सम्बन्ध होता है तभी उस विषय का सुखानुभव या ज्ञान आत्मा को होता है। 'अपवर्ग' दशा में आत्मा इन सम्बन्धों से मुक्त रहता है। मन परमाणु है; परन्तु आत्मा अमर तथा नित्य है। आत्मा ही सांसारिक विषयों में आसक्त होता है, यही विषयों में राग या द्वेष करता है, यही कर्मों के शुभाशुभ फलों का भोक्ता है। मिथ्याज्ञान, राग, द्वेष तथा मोह से प्रेरित हो कर आत्मा शुभाशुभ कर्म करता है। इन्हीं के कारण यह 'आत्मा' जन्म-मरण के जाल में फँसता है। 'तत्त्वज्ञान' द्वारा जब इसके सभी दुःखों का अन्त हो जाता है तो इस को मुक्ति मिल जाती है। इसी अवस्था को 'अपवर्ग' कहते हैं। अन्य दार्शनिकों की तरह नैयायिक इस अवस्था को आनन्दमयी न मानकर सुखानुभवहीन मानते हैं। इनके मतमें, अपवर्गावस्था में आत्मा को कोई सुख या दुःख की अनुभूति नहीं होती। न्यायदर्शन 'ईश्वर' को अनेक युक्तियों से सिद्ध करता है। जैसे—पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, पर्वत आदि सभी पदार्थ कार्य हैं, अतः इन पदार्थों का निर्माण किसी अन्य कर्ता द्वारा अवश्य हुआ है। मनुष्य संसार का निर्माता नहीं हो सकता; क्योंकि उसकी बुद्धि तथा शक्ति अत्यल्प है। वह सूक्ष्म तथा अदृश्य वस्तुओं का निर्माण इतनी कलात्मक तथा सूक्ष्म पद्धति से करने में समर्थ नहीं हो सकता। वह निर्माता (ईश्वर) सर्वशक्तिमान्, अणिमाद्यष्टविधैश्वर्यसम्पन्न तथा सर्वज्ञ है। न्यायदर्शन यह मानता है कि ईश्वर ने इस संसार को अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिये नहीं; अपितु प्राणियों के कल्याण के लिये बनाया है। इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि वह दयालु होने के कारण मनुष्य के लिये सुख ही सुख के साधन बना दे, तथा दुःख का सर्वथा अभाव कर दे। मनुष्य को कर्म करने की स्वतन्त्रता है, अतः वह शुभ या अशुभ कोई भी कर्म कर सकता है; तदनुकूल ही उसे सुख-दुःख भोगना पड़ेगा। हाँ, यहाँ आकर, उस ईश्वर के अनुग्रह या मार्गदर्शन से मनुष्य उपर्युक्त प्रमेयों का तात्त्विक ज्ञान प्राप्त कर इस भवबन्धन से मुक्त हो सकता है। इस तरह ईश्वर इस जगन्निर्माण का यथेच्छ सामर्थ्य रखते हुए भी प्राणियों के शुभा- शुभ अदृष्टों के अनुकूल ही सृष्टि करता है। फिर भी उसका अनुग्रह अवश्य रहता है, कि प्राणी शुभ की ओर ही प्रवृत्त हों तथा तत्त्वज्ञान प्राप्त कर ले।
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