भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१०२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० अन्यथा हि चतुर्विधानामणूनां भूतसूक्ष्माणां मनसां च ततोऽन्यस्य क्रियाहेतो- रसम्भवात् शरीरेन्द्रियविषयाणामनुत्पत्तिप्रसङ्गः ॥ ३० ॥ विषयपरीक्षा प्रत्यक्षमनुमानमेकदेशग्रहणादुपलब्धेः ? ॥ ३१ ॥ यदिदमिन्द्रियार्थसन्निकर्षादुत्पद्यते ज्ञानम् 'वृक्ष' इति एतत् किल प्रत्यक्षम्, तत् खल्वनुमानमेव । कस्मात् ? एकदेशग्रहणात् वृक्षस्योपलब्धेः । अर्वाग्भागमयं गृहीत्वा वृक्षमुपलभते; न चैकदेशो वृक्षः । तत्र यथा धूमं गृहीत्वा वह्निमनु- मिनोति तादृगेव तद् भवति ? ॥ ३१ ॥ किं पुनर्गुह्यमाणादेकदेशाद् अर्थान्तरमनुमेयं मन्यसे ! अवयवसमूहपक्षे अवयवान्तराणि, द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्षे तानि चावयवी चेति ? अवयवसमूह- पक्षे तावदेकदेशग्रहणाद् वृक्षबुद्धेरभावः, नागृह्यमाणमेकदेशान्तरं वृक्षो गृह्य- भूत तथा इस मन में अदृष्ट गुण को छोड़कर अन्य कोई क्रियोत्पादक कारण न होने से शरीर, इन्द्रिय तथा विषयों की उत्पत्ति ही नहीं बनेगी—यह एक नयी बाधा आ खड़ी होगी ! ॥ ३० ॥ [ इस प्रकार प्रत्यक्षलक्षण के स्वरूप की परीक्षा करने के बाद उसके विषय की परीक्षा प्रारम्भ की जा रही है—] प्रत्यक्ष अनुमान ही है, क्योंकि अवयवी का एकदेश के ग्रहण से ज्ञान होता है ? ॥३१॥ इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न 'वृक्ष' यह प्रत्यक्ष ज्ञान एक तरह से अनुमान ही है; क्योंकि यह वृक्ष के एक भाग ( कुछ अवयवों ) का ग्रहण करके ही हो जाता है । वृक्ष के अगले हिस्से को देखकर यह वृक्ष का ज्ञान कर लेता है, परन्तु अगला हिस्सा ही तो वृक्ष नहीं है ! वहाँ ( अनुमान में ) जैसे धूम को देखकर वह्नि का अनुमान होता है, वही स्थिति यहाँ ( वृक्ष के प्रत्यक्ष में ) भी है। इस प्रकार 'प्रत्यक्षादि चार प्रमाण हैं' सिद्धान्ती की यह प्रतिज्ञा नष्ट हो गयी ? ॥ ३१ ॥ सिद्धान्ती पूछता है कि आप चक्षुःसन्निकर्ष से ज्ञायमान वृक्ष के अग्रभाग से अनुमान . करने योग्य दूसरा क्या पदार्थ मानते हैं ? इसके उत्तर में पूर्वपक्षी कहता है कि यहाँ हमें दो विप्रतिपत्तियां हैं—१. 'अवयवी अवयवों से पृथक् नहीं हैं' इस अवयवसमूहपक्ष में अन्य अवयवों ( जो दिखायी नहीं दिये थे ) का अनुमान करते हैं, तथा २. 'अवयवों से कोई अवयवी नामक अर्थान्तर ही उत्पन्न होता हैं'—इस द्रव्यान्तरोत्पत्तिपक्ष में अवशिष्ट अवयवों तथा अवयवी का अनुमान करते हैं? इस पर सिद्धान्ती का उत्तर है—अवयवसमूहपक्ष में, एकदेश ( अग्रभाग ) के ग्रहण से 'यह वृक्ष है' ऐसी बुद्धि नहीं हो सकती; इसी प्रकार, गृह्यमाण एकदेश की तरह

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