भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१०४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० ग्रहणम्, नेतदन्तरेणानुमानस्य प्रवृत्तिरस्ति । नत्वेतदनुमानम्; इन्द्रियार्थसन्निकर्ष- जत्वात् । न चानुमेयस्येन्द्रियेण सन्निकर्षादनुमानं भवति । सोऽयं प्रत्यक्षानु- मानयोर्लक्षणभेदो महानाश्रयितव्य इति ॥ ३२ ॥ न चैकदेशोपलब्धिरवयविसद्भावात् १ ॥ ३३ ॥ न चैकदेशोपलब्धिमात्रम् । किं तर्हि ? एकदेशोपलब्धिः, तत्सहचरितावयव्यु- पलब्धिश्च । कस्मात् ? अवयविसद्भावात् । अस्ति ह्ययमेकदेशव्यतिरिक्तोऽवयवी, तस्यावयवस्थानस्योपलब्धिकारणप्राप्तस्यैकदेशोपलब्धावनुपलब्धिरनुपपन्नेति । अकृत्स्नग्रहणादिति चेद्, न; कारणतोऽन्यस्यैकदेशस्याभावात् । न चावयवाः पहले कभी धूम-अग्नि को एक साथ प्रत्यक्ष देखने वाले को ही अब धूम के प्रत्यक्षदर्शन से अग्नि का अनुमान हो पाता है। अन्यथा अनुमान की इस पूरी प्रक्रिया में सम्बद्ध लिङ्ग ( धूम ) तथा लिङ्गी ( वह्नि ) का पहले प्रत्यक्ष, तथा अनुमानकाल में लिङ्गदर्शन के बिना अनुमान की प्रवृत्ति कैसे होगी ? इसे आप अनुमान तो कह नहीं सकते; क्योंकि यह इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य ही है । अनुमेय ( वह्नि ) का यदि इन्द्रियसन्निकर्ष हो जाये तो वह अनुमान क्यों कर होगा ! यह अनुमान और प्रत्यक्ष का सबसे बड़ा भेद है—इसे प्रत्येक जिज्ञासु को समझे रखना चाहिये ॥ ३२ ॥ [ नैयायिकों के मत से घटावयवों से भिन्न एक अलग घटादि अवयवी होता है, परन्तु बौद्धों के मत में यह अवयवी कोई पृथक् प्रमेय नहीं है, अपितु वह परमाणुरूप अवयवसमूह ही है। बौद्धों के मत में परमाणुरूप कतिपय अवयवों का प्रत्यक्ष होता है, परन्तु नैयायिकों के मत में अवयवी का भी होता है। अतः बौद्धों का आक्षेप है कि घटादि अवयवी का प्रत्यक्ष नहीं होगा, इसका समाधान कर रहे हैं—] एकदेश का ही प्रत्यक्ष नहीं होता, अपितु उसके साथ अवयवी का भी प्रत्यक्ष होता है; क्योंकि वहाँ अवयवी भी रहता है ॥ ३३ ॥

  • एकदेश ( अवयव ) मात्र का ही प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता; अपितु एकदेश के ज्ञान के साथ तत्सहचरित अवयवी का भी ज्ञान हो जाता है। कैसे ? क्योंकि उस इन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष के समय अवयव के साथ उस अवयवी की भी सत्ता रहती है। यद्यपि यह अवयवी अपने उस अवयव से पृथक् है, परन्तु जब वह अवयवसंस्थानविशेष के रूप में में उपलब्धि-कारण हो तब एकदेश की उपलब्धि के समय कारण बन कर प्रत्यक्षज्ञान करा देगा तो वहीं मौजूद अवयवी का ज्ञान न हो—यह कैसे हो सकेगा ! यदि कहो कि एकदेश का ग्रहण होने से वह नहीं दिखायी देगा ? तो यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि समवायिकारण को छोड़कर दूसरा एकदेश पृथक् नहीं है। पूर्वपक्षी कहता है कि १. इदं न सूत्रं किन्तु भाष्यमेवेति केचित् । केचित्पुनरवयविसद्भावादित्येव सूत्रमिति वदन्ति । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri