भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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५६. सू० ] शब्दसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् १२५ शब्दादर्थप्रत्ययस्य व्यवस्थादर्शनादनुमीयते—अस्ति शब्दार्थसम्बन्धो व्यवस्थाकारणम् । असम्बन्धे हि शब्दमात्रार्थमात्रे प्रत्ययप्रसङ्गः । तस्माद- प्रतिषेधः सम्बन्धस्येति ? ।। ५५ ।। अत्र समाधिः— न; सामयिकत्वाच्छब्दार्थसम्प्रत्ययस्य ।। ५६ ।। न सम्बन्धकारितं शब्दार्थव्यवस्थानम्, किं तर्हि ? समयकारितं यत्तद- वोचाम । 'अस्येदम्' इति षष्ठीविशिष्टस्य वाक्यस्यार्थविशेषोऽनुज्ञातः शब्दार्थयोः सम्बन्ध इति, समयं तमवोचाम इति । कः पुनरयं समयः ? 'अस्य शब्दस्ये- दमर्थजातमभिधेयम्'—इति अभिधानाभिधेयनियमनियोगः । तस्मिन्नुपयुक्ते शब्दा- दर्थसम्प्रत्ययो भवति । विपर्यये हि शब्दश्रवणेऽपि प्रत्ययाभावः । सम्बन्धवादि- नापि चायमवर्जनीय इति । प्रयुज्यमानग्रहणाच्च समयोपयोगो 'लौकिकानाम् । समयपालनार्थं चेदं पदलक्षणाया वाचोऽन्वाख्यानं व्याकरणम् । वाक्यलक्षणाया वाचोऽर्थो लक्षणम् । पदसमूहो वाक्यमर्थपरिसमाप्ताविति । तदेवं प्राप्तिलक्षणस्य शब्दार्थसम्बन्ध- स्यार्थतुषोऽपि अनुमानहेतुर्न भवतीति ।। ५६ ।। शब्द से अर्थज्ञान होता है—ऐसा लोक में देखने से अनुमान होता है कि शब्दार्थ- सम्बन्ध व्यवस्था का कारण है । दोनों का सम्बन्ध न मानने पर शब्दमात्र से अर्थमात्र का ज्ञान होने लगेगा । इसलिये सम्बन्ध का प्रतिषेध नहीं है—ऐसा मान लें ? ।। ५५ ।। इसका उत्तर है— नहीं; क्योंकि शब्दार्थसम्प्रत्यय सामयिक (साङ्केतिक) नहीं है ।। ५६ ।। लोक में शब्दार्थ की व्यवस्था सम्बन्धापेक्ष नहीं; अपितु संकेतापेक्ष है । ऐसा हम दोनों कहते हैं—' "इसका यह' इस षष्ठीविशिष्ट वाक्य की किसी अर्थविशेष में स्वीकृति ही शब्दार्थ का सम्बन्ध है", तो यह हम संकेत के लिये ही कहते हैं । यह संकेत क्या है ? 'इस शब्द का यह अर्थ अभिधेय है'—ऐसा विधिपरक अभिधानाभिधेय-नियम । इस नियम का उपयोग करने पर शब्द से अर्थ का ज्ञान होता है । इस संकेत का ज्ञान न हो तो विदेशी भाषा का शब्द सुनने पर भी हमें अर्थज्ञान नहीं हो पाता । शब्दार्थ- सम्बन्धवादी (मीमांसक) को भी यह संकेतनियम मानना ही पड़ेगा । लौकिकों को प्रयुज्यमान अर्थ के ग्रहण से ही संकेत-ग्रहण होता है । इस संकेत की रक्षा के लिये 'पदलक्षण अर्थात् वाचक शब्द का अन्वाख्यान' रूप व्याकरणशास्त्र बना हैं । वाक्य रूप वाणी के शब्दों का अर्थलक्षण = भेदक है । जहाँ अर्थ परिसमाप्त हो जाता हो—वह पदसमूह 'वाक्य' कहलाता है । यों, शब्दार्थ का संयोगरूप सम्बन्ध अनुमानहेतु नहीं बन सकता—यह सिद्ध हो गया ।। ५६ ।। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri