भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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५९. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १२७ श्यावशवलावास्याहुतिमभ्यवहरतो यः समयाध्युषिते जुहोति’ । व्याघाता- च्चान्यतरन्मिथ्येति । ३. पुनरुक्तदोषाच्च-अभ्यासे देद्यमाने ‘त्रिः प्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम्’ इति पुनरुक्तदोषो भवति । पुनरुक्तं च प्रमत्तवाक्यमिति । तस्मादप्रमाणं शब्दोऽनृत- व्याघातपुनरुक्तदोषेभ्य इति ॥ ५८ ॥ न; कर्मकर्तृसाधनवैगुण्यात् ॥ ५९ ॥ नानृतदोषः पुत्रकामेष्टौ, कस्मात् ? कर्मकर्तृसाधनवैगुण्यात् । इष्ट्वा पितरौ संयुज्यमानौ पुत्रं जनयत इति । इष्टिः करणं साधनम्, पितरौ कर्तारौ, संयोगः कर्म, त्रयाणां गुणयोगात् पुत्रजन्म । वैगुण्याद्विपर्ययः । इष्ट्याश्रयं तावत्कर्म अन्यत्र उसका विरोध किया जाता है-‘जो उदित में हवन करता है, उसकी आहुति को श्याव ( श्वान ) खा जाता है ( वह आहुति लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाती ), जो अनु- दित में हवन करता है, उसकी आहुति को शवल ( श्वान ) खा जाता है; जो समया- ध्युषित में हवन करता है, उस आहुति को वे दोनों ( श्वान ) मिलकर खा जाते हैं’ ( उसे लक्ष्यतक नहीं पहुंचने देते ) । ये दोनों उक्त वाक्य परस्परविरुद्ध हैं, अतः इनमें से कोई एक मिथ्या है । ३. शब्द प्रमाण मानने पर पुनरुक्त दोष भी आता है । जैसे—एकादश सामिधेनी के पञ्चदशत्वबोधक अभ्यास ( आवृत्तिगणना ) के प्रसङ्ग में-‘पहली को तीन बार तथा अन्तिम को तीन बार आवृत्त करता है’ । यह अभ्यास पुनरुक्तदोषसम्पन्न है । पुनरुक्त दोष प्रमत्तों के वाक्य में मिलता है, ऋषि-वाक्य में कैसे आया ! यदि है तो वे भी प्रमत्त हैं, उनका वाक्य प्रमाण कैसे होगा ? अतः यह सिद्ध हुआ कि अनृत, व्याघात तथा पुन- रुक्त दोषों के कारण शब्द प्रमाण नहीं है ॥ ५८ ॥ इस पूर्वपक्ष का समाधान करते हैं— अनृत दोष नहीं; क्योंकि कर्मकर्तृसाधनविपर्यय से ( वहाँ फलादर्शन है ) ॥ ५९ ॥ पुत्रकामेष्टिप्रतिपादक श्रुति में फलदर्शन न होने से अनृत दोष दिया था, वह नहीं हैं; क्योंकि वहाँ कर्म, कर्ता, तथा करण का विपर्यय हो सकता है । यज्ञ से माता-पिता संयुक्त हो कर पुत्र पैदा करते हैं—अतः यज्ञ, साधन ( करण ) हुआ, माता-पिता कर्ता हुए, उनका संयोग कर्म हुआ, तीनों के उचित सम्बन्ध से पुत्र-जन्म होता है, उनके विपर्यय में नहीं होता । यज्ञाश्रित कर्मविपर्यय जैसे—यज्ञ का साङ्गोपाङ्ग अनुष्ठान न अत्र—‘द्वौ श्वानौ श्यावशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ । ताभ्याम्पिण्डं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ ॥’ इति बलिमन्त्रोऽनुसन्धेयः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri