भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 410 में से

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१४० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० अथ मन्यसे—नियतविषयेष्वर्थेषु स्वविषये व्यभिचारो भवति, न च प्रति- षेधस्य सद्भावो विषयः ? एवं तर्हि— तत्प्रामाण्ये वा नार्थापत्त्यप्रामाण्यम् ॥ ६ ॥ अर्थापत्तेरपि कार्योत्पादेन कारणसत्ताया अव्यभिचारो विषयः । न च कारणधर्मो निमित्तप्रतिबन्धात् कार्यानुत्पादकत्वमिति ॥ ६ ॥ अभावप्रामाण्यसिद्धिः अभावस्य तर्हि प्रमाणभावाभ्यनुज्ञा नोपपद्यते । कथमिति ? नाभावप्रामाण्यं प्रमेयासिद्धेः ? ॥ ७ ॥ अभावस्य भूयसि प्रमेये लोकसिद्धे वैजात्यादुच्यते, नाभावप्रमाण्यम्; प्रमेया- सिद्धेरिति ॥ ७ ॥ अथायमर्थबहुत्वादर्थैकदेश उदाह्रियते— लक्षितेष्वलक्षणलक्षितत्वादलक्षितानां तत्प्रमेयसिद्धिः ॥ ८ ॥ तस्याभावस्य सिध्यति प्रमेयम् । कथम् ? लक्षितेषु वासःसु अनुपादेयेषु उपादेयानामलक्षितानामलक्षणलक्षितत्वाद् लक्षणाभावेन लक्षितत्वादिति । यदि यह कहो कि अर्थों में नियतविषयकत्व होने से स्वविषय में व्यभिचार बन सकता है, हम हेतु की सत्ता का निषेध नहीं कर रहे ? तब भी— प्रमाण माना जाने पर भी, वह प्रतिषेध अर्थापत्ति में सिद्ध नहीं होता ॥ ६ ॥ अर्थापत्ति का भी 'कार्योत्पत्ति ( वृष्टि ) से कारणसत्ता ( मेघसत्ता ) का व्यभिचार न होना' विषय है । कारणधर्म ( मेघसत्ता ) प्रतिबन्धकनिमित्त होने पर कार्य ( वर्षा ) की उत्पत्ति न करे तो वह अर्थापत्ति का उदाहरण नहीं बन सकता ॥ ६ ॥ शङ्का—अभाव को प्रमाण मानना आपका उचित नहीं; अभाव प्रमाण नहीं है; क्योंकि उसका कोई प्रमेय नहीं मिलता ? ॥ ७ ॥ क्योंकि अभाव का बहुत सा प्रमेय तो लोकसिद्ध ही है, इसमें वैजात्य नहीं है, अतः अभाव प्रमाण से सिद्ध होने वाला कोई प्रमेय न मिलने से वह प्रमाण नहीं है ? ॥ ७ ॥ उत्तर—अर्थबहुत्व होने पर भी अर्थैकदेश ही उपस्थित किया जा रहा है— लक्षितों में अलक्षणलक्षित होने से अलक्षित अभाव के प्रमेय बन जायेंगे ॥ ८ ॥ उस अभाव का भी प्रमेय बन सकता है, कौन ? किसी वस्तु का लक्षण कर देने पर उस लक्षण से व्यतिरिक्त पदार्थ । जैसे—चिह्नित तथा अचिह्नित, उभयविध वस्त्रों के रहते कोई किसी से अचिह्नित वस्त्र मँगवाता है तो वह झट चिह्नित वस्त्रों को उनमें से हटा कर अचिह्नित वस्त्र ले आता है । यहाँ उन अचिह्नित वस्त्रों का ज्ञान कैसे हुआ ?

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