न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० भवति, तस्मान्न व्यञ्जकः संयोगः, उत्पादके तु संयोगे संयोगजाच्छब्दाच्छब्द- सन्ताने सति श्रोत्रप्रत्यासन्नस्य ग्रहणम्-इति युक्तं संयोगनिवृत्तौ शब्दस्य ग्रहणमिति । इतश्च शब्द उत्पद्यते, नाभिव्यज्यते; कृतकवदुपचारात् । तीव्रं मन्दमिति कृतकमुपचर्यते = तीव्रं सुखं मन्दं सुखम्, तीव्रं दुःखं मन्दं दुःखमिति; उपचर्यते च तीव्रः शब्दः, मन्दः शब्द इति । व्यञ्जकस्य तथाभावाद् ग्रहणस्य तीव्रमन्दता रूपवदिति चेद् ? न; अभि- भवोपपत्तेः । संयोगस्य व्यञ्जकस्य तीव्रमन्दतया, शब्दग्रहणस्य तीव्रमन्दता भवति, न तु शब्दो भिद्यते; यथा—प्रकाशस्य तीव्रमन्दतया रूपग्रहणस्येति ? तच्च नैवम्; अभिभवोपपत्तेः । तीव्रो भेरीशब्दो मन्दं तन्त्रीशब्दमभिभवति, न मन्दः । न च शब्दग्रहणमभिभावकम्, शब्दश्च न भिद्यते । शब्दे तु भिद्यमाने युक्तोऽभिभवः । तस्मादुत्पद्यते शब्दो नाभिव्यज्यत इति । अभिभवानुपपत्तिश्च, व्यञ्जकसमानदेशस्याभिव्यक्तौ प्राप्त्यभावात् । 'व्यञ्जकेन समानदेशोऽभिव्यज्यते शब्दः' इत्येतस्मिन् पक्षे नोपपद्यतेऽभिभवः; न संयोग को उत्पादक मानने पर संयोगज शब्द से शब्दधारा सन्तान के उत्पत्ति-क्रम से श्रोत्रप्रत्यासन्न शब्द का ग्रहण होता है, अतः संयोग की निवृत्ति होने पर शब्द का ग्रहण उपपन्न ही है । इस कारण भी शब्द अनित्य है कि वह उत्पन्न होता है, अभिव्यक्त नहीं होता । यतः अनित्य में तीव्रता या मन्दता का आरोप किया जाता है । जैसे सुख में तीव्रतादि का आरोप करके 'सुख तीव्र है, मन्द है', 'दुःख तीव्र है, मन्द है' कहा जाता है, उसी प्रकार 'शब्द तीव्र है, मन्द है'—ऐसा उपचार होता है । यदि कहें कि व्यञ्जक के वैसा होने से तीव्रतादि का ग्रहण होता है, रूप की तरह ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि शब्द स्वाभिर्भाव से दूसरे आविर्भूत शब्द को दबाता है । तात्पर्य यह है—यदि कहो कि व्यञ्जक संयोग की तीव्रता-मन्दता से शब्द का ग्रहण होने से उसमें तीव्रता-मन्दता होती है, शब्द भिन्न नहीं होता; जैसे—प्रकाश की तीव्रता- मन्दता से रूप का ग्रहण होता है ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि तीव्र भेरीशब्द मन्द वीणाशब्द को दवा देता है, न कि मन्द तीव्र को । शब्दज्ञान यहाँ अभिभावक नहीं है; और शब्द आपके मत में भिन्न नहीं होता । हाँ ! शब्द यदि भिन्न हो तब तो वैसा अभि- भव युक्त है। इसलिये यह स्थिर हुआ कि शब्द उत्पन्न होता है, अभिव्यक्त नहीं होता । अभिभव अनुपपन्न भी होने लगेगा; क्योंकि व्यञ्जक समानदेशवाले शब्द की प्राप्ति अन्यदीय शब्द की अभिव्यक्ति के समय उपपन्न नहीं है । तात्पर्य यह है कि 'व्यञ्जक से समानदेशस्थ शब्द अभिव्यक्त होता है'—इस मत में अभिभव उपपन्न नहीं होता; क्योंकि भेरीशब्द से तन्त्रीशब्द का संयोग तो हुआ नहीं । अर्थात् भेरीसंयोग तन्त्री से नहीं है ।