न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० दर्शनेन कश्चिदर्थो गृहीतः, स्पर्शनेनापि सोऽर्थो गृह्यते—'यमहमद्राक्षं चक्षुषा तं स्पर्शनेनापि स्पृशामीति, यं चास्पाक्षं स्पर्शनेन तं चक्षुषा पश्यामि' इति । एकविषयौ चेमौ प्रत्ययावेककर्तृकौ प्रतिसन्धियेते, न च सङ्घातकर्तृकौ, नेन्द्रियेणै- ककर्तृकौ । तद्योऽसौ चक्षुषा त्वगिन्द्रियेण चैकार्थस्य ग्रहीता भिन्ननिमित्ताव- नन्यकर्तृकौ प्रत्ययौ समानविषयौ प्रतिसन्दधाति, सोऽर्थान्तरभूत आत्मा । कथं पुनर्नेन्द्रियेणैककर्तृकौ ? इन्द्रियं खलु स्वस्वविषयग्रहणमनन्यकर्तृकं प्रतिसन्धातुमर्हति, नेन्द्रियान्तरस्य विषयान्तरग्रहणमिति । कथं न सङ्घात- कर्तृकौ ? एकः खल्वयं भिन्ननिमित्तौ स्वात्मकर्तृकौ प्रत्ययौ प्रतिसंहितौ वेदयते, न सङ्घातः । कस्मात् ? अनिवृत्तं हि सङ्घाते प्रत्येकं विषयान्तरग्रहणस्याप्रति- सन्धानमिन्द्रियान्तरेणेवेति ॥ १ ॥ न, विषयव्यवस्थानात् ? ॥ २ ॥ न देहादिसङ्घातादन्यश्चेतनः । कस्मात् ? विषयव्यवस्थानात् । व्यवस्थित- विषयाणीन्द्रियाणि—चक्षुष्यसति रूपं न गृह्यते, सति च गृह्यते । यच्च यस्मिन्न- दर्शन ( चक्षुरिन्द्रिय ) द्वारा जो अर्थ गृहीत हुआ, वही स्पर्शन ( त्वगिन्द्रिय ) से भी गृहीत होता है, जैसे—'जिसको मैंने पहले आंखों देखा था आज उसे मैं छू भी रहा हूँ' या 'जिसको मैं पहले कभी छू पाया था उसे आज आँखों देख रहा हूँ'—ये दोनों ज्ञान एकविषय तथा एककर्तृक प्रतिगृहीत होते हैं, न कि सङ्घातकर्तृक या इन्द्रियविशेष द्वारा एककर्तृक हो सकते हैं । यह जो एक है और चक्षु एवं त्वगिन्द्रिय से एकार्थ का ग्रहण करता है वह प्रमाता 'ये दोनों ज्ञान भिन्नेन्द्रियनिमित्तक अनन्यकर्तृक ( आत्मकर्तृक ) तथा समानविषय वाले हैं'—ऐसा प्रतिसन्धान करता है । वह अन्य अर्थ आत्मा है । इन्द्रियविशेष द्वारा एककर्तृक क्यों नहीं ? इन्द्रियाँ अनन्यकर्तृक स्वस्वविषयक ज्ञान की उत्पादक हो सकती हैं, न कि इन्द्रियान्तर के विषयान्तर के ज्ञान की । सङ्घातकर्तृक क्यों नहीं ? यह एक ही व्यक्ति भिन्न इन्द्रियों के निमित्त वाले स्वात्मकर्तृक दो ज्ञानों का अनुसन्धान कर सकता है, यह सङ्घात नहीं हैं; क्योंकि एक सङ्घात दूसरे विषय का ग्रहण करने में समर्थ नहीं होता, किंतु अपने-अपने विषय का ग्रहण करने में समर्थ है । अतः इससे भी परस्पर भिन्न इन्द्रिय की तरह से अननुसन्धान ही रहेगा ? ॥ १ ॥ शंका— अन्य चेतन की आवश्यकता नहीं; क्योंकि इन्द्रियों के विषयनियम से ही काम चल जायेगा ? ॥ २ ॥ देहादिसङ्घात से अन्य चेतन मानने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि इन्द्रियों के विषयनियम से व्यवस्था बन जायेगी । इन्द्रियाँ व्यवस्थित विषय वाली हैं—चक्षु के न रहने पर रूप का ग्रहण नहीं होता, उसके रहने पर होता है । जो जिसके न होने पर