न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० रसं गन्धं वा पूर्वगृहीतमनुमिनोति, गन्धप्रतिसंवेदी च रूपरसावनुमिनोति । एवं विषयशेषेष्वपि वाच्यम्। रूपं दृष्ट्वा गन्धं जिघ्रति, घ्रात्वा च गन्धं रूपं पश्यति । तदेवमनियतपर्यायं सर्वविषयग्रहणमेकचेतनाधिकरणमनन्यकर्तृकं प्रतिसन्धत्ते, प्रत्यक्षानुमानागमसंशयान् प्रत्ययांश्च नानाविषयान् स्वात्मकर्तृकान् प्रतिसन्द- धाति, प्रतिसन्धाय वेदयते । सर्वविषयं च शास्त्रं प्रतिपद्यते । अर्थमविषयभूतं श्रोत्रस्य क्रमभाविनो वर्णान् श्रुत्वा पदवाक्यभावेन प्रतिसन्धाय शब्दार्थव्यवस्थां च बुध्यमानोऽनेकविषयमर्थजातमग्रहणीयमेकैकेनेन्द्रियेण गृह्णाति । सेयं सर्वज्ञस्य ज्ञेयाव्यवस्थाऽनुपदं न शक्या परिक्रमितुम् । आकृतिमात्रं¹ तूदाहृतम् । तत्र यदु- क्तम्—'इन्द्रियचैतन्ये सति किमन्येन चेतनेन', तदयुक्तं भवति ॥ ३ ॥ शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् [ ४-६ ] १. इतश्च देहादिव्यतिरिक्त आत्मा, न देहादिसङ्घातमात्रम्; शरीरदाहे पातकाभावात् ॥ ४ ॥ शरीरग्रहणेन शरीरेन्द्रियबुद्धिवेदनासङ्घातः प्राणिभूतो गृह्यते, प्राणिभूतं गन्ध का ज्ञान कर रहा है, गन्धप्रतिसंवेदी रूप-रस का अनुमान कर रहा है'। इसी तरह अन्य विषयों के बारे में कहना चाहिये—यह रूप को देखकर गन्ध सूंघता है, गन्ध सूंघकर रूप को देखता है । इस प्रकार प्रमाता अनियतक्रम सर्वविषय-ज्ञान को एक चेतन के आश्रय से तथा एककर्तृक रूप में प्रतिसन्धान करता है; प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द तथा संशयों को एवं नानाविषयक ज्ञानों को एककर्तृक रुप में प्रतिसन्धान करता है, वैसा करके जान लेता है, सर्वविषयक शास्त्र को जान लेता है ! प्रमाता श्रोत्र के अगोचर अर्थ को, क्रमभावी वर्णों को, सुनकर पदवाक्यभाव में प्रतिसन्धान करके शब्दार्थव्यवस्था को समझता हुआ एक ही इन्द्रिय से ग्रहण न करने योग्य अनेकविषयक अर्थों को एक-एक इन्द्रिय से ग्रहण करता है । सर्वज्ञ की यह ज्ञेयव्यवस्था किसी भी तरह अतिक्रान्त नहीं की जा सकती । यों हमने सामान्यतः यह एक उदाहरण दे दिया है । अतः आप (पूर्वपक्षी—चार्वाकमतानुयायी) का यह कहना—'इन्द्रियचैतन्य के रहते अन्य चेतन मानने की आवश्यकता नहीं'—सर्वथा आयुक्त है ॥ ३ ॥ १. इस कारण भी देहादिसङ्घात नहीं, अपितु देहादिव्यतिरिक्त ही आत्मा हैं; शरीर-दाह में पातक न होने से ॥ ४ ॥ सूत्र में 'शरीर' से शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदनासमूहरूप प्राणी से तात्पर्य है । शास्त्र में प्राणमय शरीर को जलाने में प्राणिहिंसा कृत पाप 'पातक' कहा गया है (केवल शरीर १. 'सामान्यमात्रमित्यर्थः' । तदेतच्चेतनवृत्तं देहादिभ्यो व्यावर्तमानं तदतिरिक्तं चेतनं साधयतीति नेच्छाद्याधारत्वं देहादीनाम्' इति तात्पर्यटीकायां वाचस्पतिमिश्राः ।