भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१८२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० एकविनाशे द्वितीयाविनाशान्नैकत्वम् ॥ ९ ॥ एकस्मिन्नुपहते चोद्धृते वा चक्षुषि द्वितीयमवतिष्ठते चक्षुर्विषयग्रहणलिङ्गम् । तस्मादेकस्य व्यवधानानुपपत्तिः ॥ ९ ॥ अवयवनाशेऽप्यवयव्युपलब्धेरहेतुः ? ॥ १० ॥ एकविनाशे द्वितीयाविनाशादित्यहेतुः । कस्मात् ? वृक्षस्य हि कासुचिच्छा- खासु छिन्नासूपलभ्यत एव वृक्षः ? ॥ १० ॥ दृष्टान्तविरोधादप्रतिषेधः ॥ ११ ॥ न कारणद्रव्यस्य विभागे कार्यद्रव्यमवतिष्ठते; नित्यत्वप्रसङ्गात् । बहुष्वव- यविषु यस्य कारणानि विभक्तानि तस्य विनाशः, येषां कारणान्यविभक्तानि तानि अवतिष्ठन्ते । अथवा, दृश्यमानार्थविरोधो दृष्टान्तविरोधः । मृतस्य हि शिरःकपाले द्वाव- वटौ नासास्थिव्यवहितौ चक्षुषः स्थाने भेदेन गृह्येते । न चैतदेकस्मिन्नासास्थि- व्यवहिते सम्भवति । एक का विनाश होने पर भी अन्य विनाश न होने से एकत्वसिद्धि नहीं ॥ ९ ॥ एक चक्षु के नष्ट होने या निकाल लेने पर भी दूसरी रहती है; क्योंकि प्रमाता उस समय भी दूसरी अवशिष्ट चक्षु से विषय को गृहीत करता हुआ देखा जाता है। इसलिए 'नासिकास्थि के व्यवधान से वहाँ द्वित्वभ्रम हो रहा हैं'-ऐसा मानना अयुक्तियुक्त है ॥ ९ ॥ शङ्का-( आपका उक्त हेतु भी नहीं बनता; क्योंकि ) लोक में अवयव के खण्डित होने पर भी अवयवी से काम चलता हुआ देखा जाता है ? ॥ १० ॥ एक के नाश होने पर भी दूसरे का नाश नहीं होता—अतः आपका हेतु असिद्ध है। जैसे वृक्ष की कुछ शाखाएँ काट दी जाने पर भी वह वृक्ष ही कहलाता है। तथा प्रमाता को पूर्ववत् अर्थसाधन में कोई बाधा न होगी ? ॥ १० ॥ समाधान- विरुद्ध दृष्टान्त देकर प्रतिषेध नहीं किया जा सकता ॥ ११ ॥ कारणद्रव्य के विभाग (विनाश) हो जाने पर कार्य द्रव्य की सत्ता नहीं रह जाती; अन्यथा वह कार्य द्रव्य नित्य हो जायेगा । जहाँ बहुत से अवयवी हैं, उनमें जिसके कारण नष्ट हो गये उसका नाश हो गया । जिनके कारण नष्ट नहीं हुए वे अवस्थित रहते हैं। उक्त दृष्टा में 'पहले जैसा यह वृक्ष'-ऐसा प्रत्यभिज्ञान नहीं; अपितु 'कटी शाखा वाला वृक्ष'—ऐसा प्रत्यभिज्ञान होता है । अथवा, इस सूत्र का व्याख्यान यों है—यहाँ प्रत्यक्ष दृश्यमान अर्थ का विरोध होने से 'दृष्टान्तविरोध' हो गया ! मृतक के कङ्कालस्थ शिरःकपाल में नासास्थि से व्यवहित