भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 410 में से

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१४. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८५ शिष्टः पूर्वज्ञातोऽर्थो विषयो नार्थमात्रम्, 'ज्ञातवानहममुमर्थम्, असावर्थो मया ज्ञातः, अस्मिन्नर्थे मम ज्ञानमभूत्' इति चतुर्विधमेतद्वाक्यं स्मृतिविज्ञापकं समानार्थम् । सर्वत्र खलु ज्ञाता ज्ञानं ज्ञेयं च गृह्यते । अथ प्रत्यक्षेऽर्थे या स्मृतिस्तया त्रीणि ज्ञानानि एकस्मिन्नर्थे प्रतिसन्धीयन्ते समानकर्तृकाणि, न नानाकर्तृकाणि, नाकर्तृकाणि, किं तर्हि ? एककर्तृकाणि- 'अद्राक्षममुमर्थं यमेवैतर्हि पश्यामि' । अद्राक्षमिति दर्शनं दर्शनसंविच्च, न खल्व- संविदिते स्वे दर्शने स्यादेतत् 'अद्राक्षम्' इति, ते खल्वेते द्वे ज्ञाने; 'यमेवैतर्हि पश्यामि' इति तृतीयं ज्ञानम्, एवमेकोऽर्थस्त्रिभिर्ज्ञानैर्यूज्यमानो नाकर्तृको न नानाकर्तृकः, किं तर्हि ? एककर्तृक इति । सोऽयं स्मृतिविषयोऽपरिसङ्ख्यायमानो विद्यमानः प्रज्ञातोऽर्थः प्रतिषिध्यते- 'नास्त्यात्मा स्मृतेः स्मर्तव्यविषयत्वात्' इति । न चेदं स्मृतिमात्रं स्मर्तव्यमात्र- विषयं वा। इदं खलु ज्ञानप्रतिसन्धानवद् स्मृतिप्रतिसन्धानम्; एकस्य सर्वविषय- त्वात् । एकोऽयं ज्ञाता सर्वविषयः स्वानि ज्ञानानि प्रतिसन्धत्ते-अमुमर्थं ज्ञास्यामि, अमुमर्थं विजानामि, अमुमर्थमज्ञासिषम्, अमुमर्थं जिज्ञासमानश्चिरमज्ञात्वाऽध्य- था'—यह स्मृति अर्थमात्र नहीं; अपितु ज्ञातृज्ञानविशिष्ट पूर्वज्ञात अर्थ इसका विषय है। 'इस अर्थ को मैं जान चुका', 'यह अर्थ मेरे द्वारा जाना गया', 'इस विषय में मेरा ज्ञान था'—ये चारों वाक्य स्मृतिविषयज्ञापक तुल्य ही हैं, अर्थात् उक्त चारों वाक्यों का ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता तीनों का समान ज्ञान होता है। एक बात और सुनिये—प्रत्यक्ष अर्थ की स्मृति में ज्ञानत्रय का एक साथ समान- कर्तृक प्रतिसन्धान होता है, वे ज्ञान न तो नानाकर्तृक हैं न अकर्तृक ही; अपितु एक- कर्तृक हैं। 'इस अर्थ को मैंने पहले भी देखा था जिसको कि अब देख रहा हूँ' यहाँ 'देखा था' यह दर्शन तथा दर्शनसंवित्—दो चीज एकत्र हैं; क्योंकि 'देखा था' यह प्रत्यभिज्ञान असंविदित स्वदर्शन में नहीं हो सकता। यों, ये दो ज्ञान हुए। तीसरा ज्ञान है 'जिसको कि मैं अब देख रहा हूँ'। इस प्रकार एक ही अर्थ तीन ज्ञानों से युक्त होता हुआ न तो अकर्तृक हो सकता है, न नानाकर्तृक ही होगा। यों यह अपरिसंख्यायमान स्मृतिविषय, प्रमाणों द्वारा सिद्धार्थ है, विद्यमान है; फिर भी पूर्वपक्षी नास्तिक द्वारा खण्डित किया जा रहा है कि 'स्मृति हेतु से आत्मा की सिद्धि नहीं बनेगी; क्योंकि स्मृति तो स्मर्तव्यविषया हैं' ! हम कहते हैं—न तो यह स्मृतिमात्र है, और न स्मर्तव्यविषयमात्र है; यह तो ज्ञानप्रतिसन्धान की तरह स्मृतिप्रतिसन्धान है; क्योंकि यहाँ एक (आत्मा) ही सभी विषयों का ग्राहक है। यह एक ज्ञाता (आत्मा) सब विषयों वाला है, अतः अपने ज्ञानों का प्रतिसन्धान करता है—'इस अर्थ को जानूँगा', 'इस अर्थ को जानता हूँ', 'इस अर्थ को जानता था'। अमुक अर्थ को जानने को इच्छा

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