भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१९. सू० ] . आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १८९ जातः खल्वयं कुमारकोऽस्मिन् जन्मन्यगृहीतेषु हर्षभयशोकहेतुषु हर्षभय- शोकान् प्रतिपद्यते लिङ्गानुमेयान् । ते च स्मृत्यनुबन्धादुत्पद्यन्ते, नान्यथा । स्मृत्यनुबन्धश्च पूर्वाभ्यासमन्तरेण न भवति । पूर्वाभ्यासश्च पूर्वजन्मनि सति, नान्यथेति सिद्धयत्येतत्—अवतिष्ठतेऽयमूर्ध्वं शरीरभेदादिति ॥ १८ ॥ पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकारवत् तद्विकारः ? ॥ १९ ॥ यथा पद्मादिष्वनित्येषु प्रबोधसम्मीलनं विकारो भवति, एवमनित्यस्यात्मनो हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तिर्विकारः स्यात् ? हेत्वभावादयुक्तम् । अनेन हेतुना पद्मादिषु प्रबोधसम्मीलनविकारवदनित्य- स्यात्मनो हर्षादिसम्प्रतिपत्तिरिति नात्रोदाहरणसाधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतु; न वैधर्म्यादस्ति, हेत्वभावाद् असम्बद्धार्थकमपार्थकमुच्यते इति । दृष्टान्ताच्च हर्षादिनिमित्तस्यानिवृत्तिः । या चेयमासेवितेषु विषयेषु हर्षा- दिसम्प्रतिपत्तिः स्मृत्यनुबन्धकृता प्रत्यात्मं गृह्यते, सेयं पद्मादिसम्मीलनदृष्टान्तेन न निवर्तते । यथा चेयं न निर्वर्त्तते तथा जातस्यापीति । क्रियाजाताश्च पर्णसंयोग- यह उत्पन्न हुआ बालक इस जन्म में अगृहीत परन्तु लिंग से अनुमेय हर्ष, भय, शोक आदि से ग्रस्त होता है । ये हर्ष-भयादि उन्हीं की स्मृति के अनुबन्ध से उत्पन्न हो सकते हैं, अन्यथा नहीं । यह स्मृत्यनुबन्ध पूर्वाभ्यास से उत्पन्न हो सकता है, अन्यथा नहीं । पूर्वाभ्यास पूर्व जन्म मानने पर बन सकता है, अन्यथा नहीं । अतः सिद्ध होता है कि शरीरनाश के बाद भी आत्मा विद्यमान है ॥ १८ ॥ शंका— पद्मादि के संकोच-विकासादि विकारों की तरह आत्मा के विकार मान लें ? ॥१९॥ जैसे लोक में अनित्य पद्मादि में संकोच-विकास रूप विकार देखा जाता है, वैसे ही अनित्य आत्मा में हर्ष, शोक भय आदि का सम्प्रतिपत्तिरूपविकार मान लें ? ॥ १९ ॥ उत्तर—हेतुत्व न होने से ऐसा मानना अयुक्त है । 'इस हेतु से पद्मादि के संकोच- विकास की तरह अनित्य आत्मा को हर्ष शोकादि की सम्प्रतिपत्ति होती है'—इस उदा- हरणसाधर्म्य तथा उदाहरणवैधर्म्य मात्र से जन्मान्तरीय,अनुभवजन्य संस्कार बालक में नहीं बनता; अतः हेतु न होने से इसके असम्बद्धार्थ हो जाने पर यह उदाहरण निरर्थक है । दृष्टान्त से भी हर्षादि निमित्त का अनिषेध ही रहेगा । विषयों के आसेवन से हर्ष शोकादि की सम्प्रतिपत्ति पूर्वानुभवज स्मृति-अनुबन्ध से होती हुई प्रत्येक आत्मा को गृहीत होती है, यह पद्मादि के संकोच विकासवाले दृष्टान्त से प्रतिषिद्ध नहीं की जा सकती । अथ च, जैसे पद्मादि की संकोच-विकास क्रिया निवृत्त नहीं होती, वैसे ही उत्पन्न बालक की हर्ष-शोकादि सम्प्रतिपत्तियां निवृत्त नहीं होती । वहां संकोचविकास क्रियोत्पन्न पत्रा- दिसंयोगविभाग से अतिरिक्त नहीं हैं । क्रियाहेतु का क्रिया से अनुमान किया जाता है । ऐसा