भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२६. सू० ] आत्मनित्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् १९३ तेषु तेषु रज्यते, तथा चायं द्वयोर्जन्मनोः प्रतिसन्धिः । एवं पूर्वशरीरस्य पूर्व- तरेण, पूर्वतरस्य पूर्वतमेनेत्यादिनाऽनादिश्चेतनस्य शरीरयोगः, अनादिश्च रागा- नुबन्ध इति सिद्धं नित्यत्वमिति ॥ २४ ॥ कथं पुनर्ज्ञायते—पूर्वानुभूतविषयानुचिन्तनजनितो जातस्य रागः, न पुनः— सगुणद्रव्योत्पत्तिवत् तदुत्पत्तिः ? ॥ २५ ॥ यथोत्पत्तिधर्मकस्य द्रव्यस्य गुणाः कारणत उत्पद्यन्ते, तथोत्पत्तिधर्मकस्या- त्मनो रागः कुतश्चिदुत्पद्यते ? ॥ २५ ॥ अत्रायमुदितानुवादो निदर्शनार्थः । न; सङ्कल्पनिमित्तत्वाद्भागादीनाम् ॥ २६ ॥ न खलु सगुणद्रव्योत्पत्तिवदुत्पत्तिरात्मनो रागस्य च । कस्मात् ? सङ्कल्पनि- मित्तत्वाद्भागादीनाम् । अयं खलु प्राणिनां विषयानासेवमानानां सङ्कल्पजनितो रागो गृह्यते, सङ्कल्पश्च पूर्वानुभूतविषयानुचिन्तनयोनिः । तेनानुमीयते—जात- स्यापि पूर्वानुभूतार्थचिन्तनकृतो राग इति । आत्मोत्पादाधिकरणानां तु रागोत्पत्ति- राग को प्राप्त होता है । यही राग दो जन्मों की प्रतिसन्धि कहलाता है । इस रीति से पूर्वशरीर का उससे पहलेवाले शरीर के साथ, तथा उससे पहलेवाले का उससे भी पहलेवाले शरीर के साथ—यों यह चेतन शरीर का सम्बन्ध अनादि चला आ रहा है, इसी के साथ साथ राग भी अनादि प्रवाह से चला आ रहा है । अतः इस राग के उत्पत्तिविनाश हेतु से भी आत्मा का नित्यत्व सिद्ध होता है ॥ २४ ॥ शङ्का—यह कैसे ज्ञात हो कि उत्पन्न शिशु का यह राग पूर्वानुभूत विषयानुचिन्तन से ही जनित है, क्यों नहीं— सगुण द्रव्य की उत्पत्ति की तरह उस राग की उत्पत्ति मान लें ? ॥ २५ ॥ जैसे उत्पत्तिधर्मा घटादि द्रव्य के गुण कारण से उत्पन्न होते हैं, उसी तरह उत्पत्ति- धर्मक आत्मा का राग भी किसी कारण से उत्पन्न होता होगा ? ॥ २५ ॥ उत्तर—यहाँ यह कथित का अनुकथन नये दृष्टान्त मात्र के लिये है, पहले अयस्कान्त के दृष्टान्त से यह बात कही थी, अब घटादि के दृष्टान्त से कह रहे हो । रागादिक के सङ्कल्पनिमित्तक होने से यह नहीं कह सकते ॥ २६ ॥ सगुण द्रव्य की उत्पत्ति की तरह आत्मा तथा उसके राग की उत्पत्ति नहीं मान सकते; क्योंकि रागादि संकल्पनिमित्तक है । यह संकल्पजनित राग विषयों का आसेवन करने वाले प्राणियों में ही देखा जाता है । तथा उक्त संकल्प पूर्वानुभूत विषयानुचिन्तन से होता है । अतः अनुमान होता है—'सद्योजात शिशु को भी पूर्वानुभूतार्थचिन्तनजनित राग उत्पन्न होता है' । आत्मोत्पत्तिपक्ष में तो संकल्प से अन्य रागकारण सिद्ध होने पर, कार्यद्रव्य गुण की तरह, रागोत्पत्ति होती हुई कही जा सकती है; परन्तु आत्मोत्पत्ति न्या० द० : १३ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

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