भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३०. सू० ] शरीरपरीक्षाप्रकरणम् १९५ पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः ॥ २७ ॥ तत्र मानुषं शरीरं पार्थिवम् । कस्मात् ? गुणान्तरोपलब्धेः । गन्धवती पृथिवी, गन्धवच्च शरीरम् । अबादीनामगन्धत्वात् तत्प्रकृत्यगन्धं स्यात् । न त्विदमबादिभिरसम्पृक्तया पृथिव्याऽऽरब्धं चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयभावेन कल्पते इत्यतः पञ्चानां भूतानां संयोगे सति शरीरं भवति । भूतसंयोगो हि मिथः पञ्चानां न निषिद्ध इति । आप्यतैजसवायव्यानि लोकान्तरे शरीराणि, तेष्वपि भूतसं- योगः पुरुषार्थतन्त्र इति । स्थाल्यादिद्रव्यनिष्पत्तावपि निःसंशया नाबादिसंयोग- मन्तरेण निष्पत्तिरिति ॥ २७ ॥ पार्थिवाप्यतैजसं तद्गुणोपलब्धेः ? ॥ २८ ॥ निःश्वासोच्छ्वासोपलब्धेश्चातुर्भौतिकम् ? ॥ २९ ॥ गन्धक्लेदपाकव्यूहावकाशदानेभ्यः पाञ्चभौतिकम् ? ॥ ३० ॥ त इमे सन्दिग्धा हेतव इत्युपेक्षितवान् सूत्रकारः । कथं सन्दिग्धाः ? सति पृथ्वी गुण की उपलब्धि होने से यह मानव शरीर पार्थिव हैं ॥ २७ ॥ यह मनुष्य-शरीर पार्थिव है; क्योंकि उसमें पार्थिव गुण विशेष की उपलब्धि होती है । पृथिवी गन्धवती है, शरीर भी गन्धवान् है । यदि यह शरीर जलादिप्रकृतिक होता तो यह भी जलादि की तरह निर्गन्ध होता । परन्तु यह जलादि से सम्पृक्त हुए विना अकेले पृथ्वी से आरब्ध (निर्मित) होता तो इसमें चेष्टा, इन्द्रिय, अर्थाश्रयत्व इत्यादि न बन पाते; क्योंकि ये गुण पृथ्वी में नहीं हैं, अतः पाँचों भूतों के संयोग से ही इस शरीर की निष्पत्ति हुई है । इन पाँचों भूतों का आपस में मिलना किसी भी वादी को अनिष्ट भी नहीं है । यद्यपि दूसरे लोकों में शरीर केवल जल-वायु-तेजःप्रकृतिक है, पर उनमें भी इन भूतों का संयोग पुरुषार्थसाध्य है । स्थाल्यादि पदार्थों का निष्पादन भी निस्सन्देह जलादिसंयोग के विना नहीं हो पाता ॥ २७ ॥ शङ्का— इस शरीर को पार्थिव, आप्य तथा तैजस मान लें, उन भूतों के गुणों की उपलब्धि होने से ? ॥ २८ ॥ शरीर में निःश्वास, उच्छ्वास की उपलब्धि से इसे चातुर्भौतिक मान लें ? ॥२९॥ अथवा—इसमें गन्ध, आर्द्रता, अन्नपाक, भुक्तान्नपान, रससञ्चरण तथा दूसरे भूतों को इतस्ततः सञ्चरण के लिये अवकाशदान से इसे पाञ्चभौतिक मान लें ? ॥ ३० ॥ इन तीनों सूत्रों में कथित हेतु सन्दिग्ध हैं, अतः सूत्रकार ने इनकी उपेक्षा की । सन्दिग्ध कैसे हैं ? तत्तद्गुणवान् द्रव्य के प्रकृतिभाव में भी भूतों के धर्मों की