न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३. सू० ] इन्द्रिपरीक्षाप्रकरणम् १९७ कुतः संशयः ? कृष्णसारे सत्युपलम्भाद् व्यतिरिच्य चोपलम्भात् संशयः ॥ ३२ ॥ कृष्णसारं भौतिकम्, तस्मिन्ननुपहते रूपोपलब्धिः, उपहते चानुपलब्धिरिति । व्यतिरिच्य कृष्णसारमवस्थितस्य विषयस्य उपलम्भः, न कृष्णसारप्राप्तस्य । न चाप्राप्यकारित्वमिन्द्रियाणां तदिदमभौतिकत्वे विभुत्वात्सम्भवति । एवमुभय- धर्मोपलब्धेः संशयः ॥ ३२ ॥ साङ्ख्यमतखण्डनम् अभौतिकानीत्याह १। कस्मात् ? महदणुग्रहणात् ॥ ३३ ॥ 'महत्' इति महत्तरं महत्तमं चोपलभ्यते, यथा—न्यग्रोधपर्वतादि । 'अणु' इति अणुतरमणुतमं च गृह्यते, यथा—न्यग्रोधधानादि । तदुभयमुपलभ्यमानं चक्षुषो भौतिकत्वं बाधते । भौतिकं हि यावत्तावदेव व्याप्नोति । अभौतिकं तु विभुत्वात् सर्वव्यापकमिति ॥ ३३ ॥ यह संशय क्यों उठा ? कनीनिका के होने पर रूपोपलब्धि होने से, तथा उस कनीनिका के समीपस्थ विषय की उपलब्धि होने से ॥ ३२ ॥ कृष्णसार ( = कनीनिका ) भौतिक ( तैजस ) है । क्योंकि उसके रहने पर रूपो- पलब्धि होती है, न रहने पर नहीं हो पाती । कनीनिका से कुछ दूर पड़े पदार्थ की उपलब्धि हो पाती है, परन्तु उसको कनीनिका से सर्वथा सम्बद्ध कर देने पर रूपोपलब्धि नहीं होती । और, इन्द्रियाँ अप्राप्यकारी नहीं हैं, अतः उन्हें अभौतिक मानने पर भी विभुत्व धर्म से उनमें यह उपलब्धि बन सकती है । यों इन्द्रियों के विषय में दोनों तरह की कोटि मिलने से संशय होता है ॥ ३२ ॥ 'इन्द्रियाँ अभौतिक हैं'—ऐसा सांख्यमत हैं; कैसे ?— बड़े से बड़े तथा न्यून से न्यून परिमाण का ग्रहण होने से ॥ ३३ ॥ 'महत्' से महत्तर, महत्तम का भी ग्रहण होता है, जैसे—विशाल वट वृक्ष या पर्वत आदि । 'अणु' से भी अणुतर, अणुतम का ग्रहण होता है, जैसे—वटबीज आदि । इन दोनों—'महद्' तथा 'अणु' के कनीनिका द्वारा गृहीत होने से चक्षु का भौतिकत्व बाधित होता है, क्योंकि भौतिक विकार एक सीमित परिमाण को ही व्याप्त कर सकता है । हाँ, अभौतिक अपेक्षानुसार व्यापक परिमाण को भी व्याप्त कर सकता है; क्योंकि वह विभु है ॥ ३३ ॥ १. सांख्य इति शेषः । इदानीं सूत्रकारः सांख्यमतमुत्थाप्य 'अक्षिकनीनिकैवेन्द्रियम्' इति बौद्धमतं दूषयति ।