भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 410 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 217

३८. सू० ] इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् १९९ लब्धिर्नासावभावं प्रतिपादयति, यथा—चन्द्रमसः परभागस्य, पृथिव्याश्चाधो- भागस्य ॥ ३६ ॥ द्रव्यगुणधर्मभेदाच्चोपलब्धिनियमः ॥ ३७ ॥ भिन्नः खल्वयं द्रव्यधर्मो गुणधर्मश्च, महदनेकद्रव्यञ्च १विषक्तावयवमाप्यं द्रव्यं प्रत्यक्षतो नोपलभ्यते, स्पर्शस्तु शीतो गृह्यते, तस्य द्रव्यस्यानुबन्धात् हेमन्त- शिशिरौ कल्पेते, तथाविधमेव च तैजसं द्रव्यमनुद्भूतरूपं सह रूपेण नोपलभ्यते, स्पर्शस्त्वस्योष्ण उपलभ्यते; तस्य द्रव्यस्यानुबन्धाद् ग्रीष्मवसन्तौ कल्पेते ॥ ३७ ॥ यत्र त्वेषा भवति— अनेकद्रव्यसमवायात् २ रूपविशेषाच्च रूपोपलब्धिः ३ ॥ ३८ ॥ यत्र रूपं च द्रव्यं च तदाश्रयः प्रत्यक्षत उपलभ्यते, रूपविशेषस्तु यद्भावात् क्वचिद्रूपोपलब्धिः, यदभावाच्च द्रव्यस्य क्वचिदनुपलब्धिः—स रूपधर्मोऽयमुद्भव- समाख्यात इति । अनुद्भूतरूपश्चायं नायनो रश्मिः, तस्मात् प्रत्यक्षतो नोपलभ्यत प्रत्यक्ष से उपलब्ध नहीं होता तो उनके विषय में क्या हम यह मान बैठते हैं कि उनका अभाव है ! ॥ ३६ ॥ तथा द्रव्यगुणभेद से उपलब्धि में नियम होता है ॥ ३७ ॥ ये द्रव्य तथा गुण के धर्म भिन्न-भिन्न हैं। कोई प्रत्यक्षतः उपलब्ध हो जाता है, कोई नहीं होता। जैसे जलीय द्रव्य ( वायुनीत जलीय त्र्यणुकादि ) महान्, अनेकद्रव्यवान् तथा विभक्तावयव होते हुए भी प्रत्यक्ष से उपलब्ध नहीं होता, परन्तु उसका शीतस्पर्श प्रत्य- क्षतः गृहीत है; उसी से द्रव्य अनुमेय है। अतः उस द्रव्य के अनुबन्ध से हेमन्त-शिशिर ऋतु की कल्पना की जाती है। इसी प्रकार, तैजस द्रव्य, जिसका रूप अनुद्भूत है, रूप से युक्त होने पर भी प्रत्यक्ष नहीं होता; परन्तु उसका उष्ण स्पर्श प्रत्यक्षतः अनुभूत होता है; उसीसे द्रव्य अनुमेय होता है। उस द्रव्य के अनुबन्ध से ग्रीष्म-वसन्त ऋतु की कल्पना की जाती है ॥ ३७ ॥ जहाँ यह रूपोपलब्धि होती है, वहाँ— अनेक द्रव्यों के समवाय सम्बन्ध होने से तथा ('उद्भूत' नामक) रूपविशेष से रूप- सहित द्रव्यों की उपलब्धि होती है ॥ ३८ ॥ जहाँ रूप, द्रव्य तथा तदाश्रय प्रत्यक्षतः उपलब्ध होते हैं; वहाँ रूपविशेष प्रयोजक है, जिसकी सत्ता से रूपोपलब्धि होती है, तथा अभाव से कहीं रूपोपलब्धि नहीं हो पाती— यह रूपधर्म 'उद्भव' कहलाता है। यह चाक्षुष रश्मि अनुद्भूत होने के कारण प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं हो पाती। लोक में तेज का भी धर्मभेद देखा जाता है, यथा—तेज १. विभक्तावयवम्—इति पाठः । २. अनेकद्रव्येण समवायादिति वार्त्तिकसम्मतः पाठः । ३. इदं सूत्रं वैशेषिकसूत्रेष्वपि ( ४. अ० १. आ० ६ सू० ) दृश्यते ।