भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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५५. सू० ] इन्द्रियनानात्वपरीक्षाप्रकरणम् २०९ सन्दिग्धश्चाव्यतिरेकः । पृथिव्यादिभिरपि भूतैरिन्द्रियाधिष्ठानानि व्याप्तानि, न च तेष्वसत्सु विषयग्रहणं भवतीति । तस्मान्न त्वगन्यद्वा सर्वविषयमेक- मिन्द्रियमिति ॥ ५३ ॥ न युगपदर्थानुपलब्धेः ॥ ५४ ॥ आत्मा मनसा सम्बध्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियं सर्वार्थैः सन्निकृष्टमिति— आत्मेन्द्रियमनोऽर्थसन्निकर्षेभ्यो युगपद् ग्रहणानि स्युः । न च युगपद्रूपादयो गृह्यन्ते, तस्मान्नैकमिन्द्रियं सर्वविषयकमस्तीति । असाहचर्याच्च विषयग्रहणानां नैकमिन्द्रियं सर्वविषयकम्, साहचर्यं हि विषयग्रहणानामन्याद्यनुपपत्तिरिति ॥५४॥ विप्रतिषेधाच्च न त्वगेका ॥ ५५ ॥ न खलु त्वगेकमिन्द्रियम्; व्याघातात् । त्वचा रूपाण्यप्राप्तानि गृह्यन्त इति, अप्राप्यकारित्वे स्पर्शादिष्वप्येवं प्रसङ्गः । स्पर्शादीनां च प्राप्तानां ग्रहणाद् रूपा- दीनां प्राप्तानां ग्रहणमिति प्राप्तम् । प्राप्याप्राप्यकारित्वमिति चेत् ? आवरणानुपपत्तेर्विषयमात्रस्य ग्रहणम् । अथापि मन्येत—प्राप्ताः स्पर्शादयस्त्वचा गृह्यन्ते, रूपाणि त्वप्राप्तानीति ? एवं अभेद हेतु भी सन्दिग्ध है । पृथिवी आदि अन्य भूतों द्वारा इन्द्रियाधिष्ठान व्याप्त हैं, उन भूतों के रहे बिना विषयज्ञान नहीं हो सकता । अतः त्वग्, या कोई अन्य इन्द्रिय एकाकी सर्वविषयग्राहक नहीं है ॥ ५३ ॥ अर्थों को एक साथ उपलब्धि न होने से एक ही इन्द्रिय नहीं है ॥ ५४ ॥ 'आत्मा मन से सम्बद्ध होता है, मन इन्द्रिय से, इन्द्रिय सब अर्थों से सन्निकृष्ट हैं'— इस सिद्धान्त से आत्मा, मन, इन्द्रिय, अर्थ के सन्निकर्षों से एक ही साथ अनेक ज्ञान होने चाहिये ! जब कि रस-रूपादिज्ञान एक साथ नहीं होते । अतः यह निश्चित है कि सर्व- विषयग्राहक एक इन्द्रिय नहीं है । यदि युगपदर्थज्ञान मानोगे तो अन्धादि को भी स्पर्श के साथ-साथ रूपादि का ज्ञान होने लगेगा ॥ ५४ ॥ विप्रतिषेध के कारण एक त्वग् ही इन्द्रिय नहीं है ॥ ५५ ॥ अर्थविरोध होने से त्वग् ही एक इन्द्रिय नहीं है; क्योंकि त्वग् से रूप अप्राप्त होते हुए गृहीत होते हैं। यों अप्राप्यकारित्व मानने पर स्पर्शादि में भी अप्राप्यकारित्वप्रसंग होने लगेगा । प्राप्त स्पर्शादि के ग्रहण से प्राप्त रूपादि का भी ग्रहणप्रसङ्ग प्राप्त होगा । यदि इन्द्रिय को प्राप्याप्राप्यकारित्व मानें तो आवरणानुपपत्ति होने से विषयमात्र का ग्रहण होने लगेगा। यदि यह मानें कि 'प्राप्य स्पर्शादि त्वग् से गृहीत हो जाते हैं, किन्तु रूपादि न्या० द० : १४