न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें११. सू० ] क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् २२९ स्फटिकेऽप्यपरावरोत्पत्तेः क्षणिकत्वाच्चव्यक्तीनामहेतुः ॥ १० ॥ स्फटिकस्याभेदेनावस्थितस्योपधानभेदान्नानात्वाभिमान इत्ययमविद्यमान- हेतुकः पक्षः । कस्मात् ? स्फटिकेऽप्यपरावरोत्पत्तेः । स्फटिकेऽपि अन्या व्यक्तय उत्पद्यन्ते, अन्या निरुद्ध्यन्त इति । कथम् ? क्षणिकत्वाद् व्यक्तीनाम् । क्षणश्चा- ल्पीयान् कालः, क्षणस्थितिकाः = क्षणिकाः । कथं पुनर्गम्यते-क्षणिका व्यक्तय इति ? उपचयापचयप्रबन्धदर्शनाच्छरीरादिषु । पक्तिनिर्वृत्तस्याहाररसस्य शरीरे रुधिरादिभावेनोपचयोऽपचयश्च प्रबन्धेन प्रवर्त्तते । उपचयाद् व्यक्तीनामुत्पादः, अपचयाद् व्यक्तिनिरोधः । एवं च सत्यवयवपरिणामभेदेन वृद्धिः शरीरस्य काला- न्तरे गृह्यते इति । सोऽयं व्यक्तिविशेषधर्मो व्यक्तिमात्रे वेदितव्य इति ॥ १० ॥ नियमहेत्वभावाद्यथादर्शनमभ्यनुज्ञा ॥ ११ ॥ सर्वासु व्यक्तिषु उपचयापचयप्रबन्धः शरीरवदिति नायं नियमः । कस्मात् ? हेत्वभावात् । नात्र प्रत्यक्षमनुमानं वा प्रतिपादकमस्तीति । तस्माद् यथादर्शनम्- स्फटिक में दूसरे-दूसरे व्यक्तियों की उत्पत्ति होते रहने के कारण व्यक्तियों के क्षणिक होने से उक्त हेतु नहीं बनेगा ॥ १० ॥ 'अभेदेन उपस्थित स्फटिक में अनुग्रहभेद से नानात्व का आरोप हैं' यह पक्ष ( प्रतिज्ञात अर्थ ) अविद्यमानहेतुक है; क्योंकि स्फटिक में भी क्षण-क्षण में दूसरे-दूसरे की उत्पत्ति है । अर्थात् प्रतिक्षण स्फटिक व्यक्ति उत्पन्न होती है, तो पहली निरुद्ध होती रहती हैं । कारण, व्यक्ति तो क्षणिक है । अल्पतर काल को 'क्षण' तथा क्षणभर स्थितिवाले को 'क्षणिक' कहते हैं । यह कैसे ज्ञात होता है कि व्यक्ति क्षणिक हैं ? शरीरादि में वृद्धि तथा ह्रास का प्रवाह देखा जाने से । जठराग्नि पाक से निष्पन्न रस से शरीर में रुधिरादिभाव की वृद्धि तथा ह्रास के प्रवाह से वृद्धि ह्रास देखे जाते हैं । वहाँ उपचय से व्यक्ति का उत्पाद कहलाता है तथा अपचय से व्यक्ति का निरोध । इस रीति से अवयवों में परिणति होते रहने से कालपरिपाकवश शरीर के वृद्धि या ह्रास गृहीत होते हैं । यह व्यक्तिविशेष में दिखाया गया निदर्शन स्फटिकादि सभी व्यक्तियों में समझना चाहिये । कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा (बौद्ध) मत स्वीकार कर लेने पर स्फटिकान्यत्व के आरोप की आवश्यकता न ही पड़ेगी, वहाँ तो क्षणिक सिद्धान्त से स्फटिकान्यत्व उपस्थित ही है ? ॥ १० ॥ आचार्य उत्तर देते हैं— क्षणिकवाद का कोई नियमहेतु न होने से जहाँ जैसा देखें वहाँ वैसा अभ्यनुज्ञान कर लेना चाहिये ॥ ११ ॥ 'सभी व्यक्तियों का उपचयापचयप्रबन्ध शरीर की तरह होता हैं'—ऐसा कोई नियम नहीं; क्योंकि इस नियम का साधक कोई हेतु नहीं है । इस नियम का प्रतिपादक न