भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२३२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने • [ ३ अ० २. आ० अत्र तु प्रतिषेधः— व्यूहान्तराद् द्रव्यान्तरोत्पत्तिदर्शनं पूर्वद्रव्यनिवृत्तेरनुमानम् ॥ १६ ॥ सम्मूर्च्छनलक्षणादवयवव्यूहाद् द्रव्यान्तरे दध्युत्पन्ने गृह्यमाणे पूर्वं पयोद्रव्य- मवयवविभागेभ्यो निवृत्तमित्यनुमीयते, यथा—मृदवयवानां व्यूहान्तराद् द्रव्या- न्तरे स्थाल्यामुत्पन्नायां पूर्वं मृत्पिण्डद्रव्यं मृदवयवविभागेभ्यो निवर्तत इति । मृद्वच्चावयवान्वयः पयोदध्नोर्नशेषनिरोधे निरन्वयो द्रव्यान्तरोत्पादो घटत इति ॥ १६ ॥ अभ्यनुज्ञाय चं निष्कारणं क्षीरविनाशं दध्युत्पादं च प्रतिषेध उच्यत इति— क्वचिद्विनाशकारणानुपलब्धेः क्वचिच्चोपलब्धेरनेकान्तः ॥ १७ ॥ क्षीरदधिवन्निष्कारणौ विनाशोत्पादौ स्फटिकव्यक्तीनामिति नायमेकान्त इति । कस्मात् ? हेतुभावात् । नात्र हेतुरस्ति—अकारणौ विनाशोत्पादौ स्फटि- कादिव्यक्तीनां क्षीरदधिवत्; न पुनर्यथा विनाशकारणभावात् कुम्भस्य विनाशः, उक्त साङ्ख्यमत का खण्डन— व्यूहान्तर से द्रव्यान्तरोत्पत्ति का दिखायी देना पूर्व द्रव्य की निवृत्ति का अनुमान करा देता है ॥ १६ ॥ सम्मूर्च्छनलक्षणक अवयवव्यूह से दधिरूप द्रव्यान्तर के गृहीत होने पर, पहले का दुग्धद्रव्य अवयवों का विभाग ( विनाश ) होने से विनष्ट हो गया—ऐसा अनुमान होता है। जैसे मिट्टी के अवयवों के व्यूहान्तर से स्थालीरूप द्रव्यान्तर के उत्पन्न होने की दशा में पहले का मृत्पिण्ड द्रव्य, मृदवयवों के विभक्त होने से निवृत्त हुआ रहता है। मृत्तिका के अन्वय की तरह दूध-दही के अन्वय की स्थिति समझनी चाहिये। सम्पूर्णतया अन्वय ( अवयव ) के न रहने में द्रव्यान्तरोत्पाद होता है—ऐसा मानना उचित नहीं। अतः 'अवस्थित का द्रव्यान्तर परिणाम' वाला साङ्ख्यसिद्धान्त अयुक्त है॥ १६॥ अथ च—निष्कारण क्षीरविनाश तथा दध्युत्पाद मान कर भी आप उसका प्रतिषेध करते हैं, यह भी उचित नहीं; क्योंकि— विनाश-कारण की कहीं अनुपलब्धि तथा कहीं उपलब्धि होने से, यह नियम नहीं कहा जा सकता ॥ १७ ॥ स्फटिक व्यक्ति में, क्षीरदधि की तरह निष्कारण विनाश उत्पाद होते हैं—यह नियम ( व्याप्ति ) नहीं बन पाती, क्योंकि इसमें कोई हेतु नहीं है। यहाँ आप कोई हेतु नहीं बता सकते कि स्फटिक व्यक्ति में क्षीर, दधि की तरह अकारण ही विनाश-उत्पाद हो जाते हैं। और इस नियम को आप निराकृत भी नहीं कर सकते कि विनाशकारण