न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० विभुरात्मा सर्वेन्द्रियैः संयुक्त इति युगपज्ज्ञानोत्पत्तिप्रसङ्ग इति ? ॥ २० ॥ इन्द्रियैर्मनसः सन्निकर्षाभावात् तदनुत्पत्तिः ॥ २१ ॥ गन्धाद्युपलब्धेरिन्द्रियार्थसन्निकर्षवदिन्द्रियमनःसन्निकर्षोऽपि कारणम्, तस्य चायौगपद्यमणुत्वान्मनसः । अयौगपद्यादनुत्पत्तिर्युगपज्ज्ञानानामात्मगुणत्वे- ऽपीति ॥ २१ ॥ यदि पुनरात्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षमात्राद् गन्धादिज्ञानमुत्पद्यते ? न; उत्पत्तिकारणानपदेशात् ॥ २२ ॥ 'आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षमात्राद् गन्धादिज्ञानमुत्पद्यते'—नात्रोत्पत्तिकारणमप- दिश्यते, येनैतत् प्रतिद्येमहीति ॥ २२ ॥ विनाशकारणानुपलब्धेश्चावस्थाने तन्नित्यत्वप्रसङ्गः ? ॥ २३ ॥ 'तदात्मगुणत्वेऽपि तुल्यम्' इत्येतदनेन समुच्चीयते । द्विविधो हि गुणनाश- विभु आत्मा सब इन्द्रियों के साथ संयुक्त होगा तो युगपज्ज्ञानोत्पाद होने लगेगा ? ॥ २० ॥ उत्तर— इन्द्रियों का मन के साथ सन्निकर्ष न होने से युगपज्ज्ञानोत्पाद नहीं होता ॥ २१ ॥ गन्धाद्युपलब्धि का, इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के कारण की तरह, इन्द्रियमनःसन्निकर्ष भी कारण है। वह इन्द्रियमनःसन्निकर्ष एक साथ अनेक जगह नहीं हो सकता; क्योंकि मन अणु है। अयौगपद्य होने से ही, ज्ञान की युगपद् उत्पत्ति आत्मगुण मानने पर भी नहीं होगी ॥ २१ ॥ यदि 'आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्ष से ही गन्धादि ज्ञान हो जाता है, तो मन की कोई आवश्यकता नहीं'—ऐसा मान लें ? उत्पत्तिकारण का प्रसङ्ग न होने से ऐसा नहीं मान सकते ॥ २२ ॥ 'आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षमात्र से ही गन्धादि ज्ञान उत्पन्न हो जाता है'—यह आप कह रहे हैं, परन्तु अभी ज्ञानोत्पत्ति के विचार का प्रसङ्ग नहीं, जिससे हम आपसे सह- मत हो सकें ॥ २२ ॥ शंका— ज्ञान के विनाशकारण की अनुपलब्धि से उस के सदा वर्तमान रहने पर उसमें नित्यता की प्रसक्ति होने लगेगी ? ॥ २३ ॥ यहाँ 'ज्ञान के आत्मगुण मानने पर भी यह बात तो बराबर है' ( ३.२.२०)—इस सूत्र का भी समुच्चय कर लेना चाहिये । गुणनाश के हेतु दो हो सकते हैं—१. या तो