भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२३८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० ज्ञानसाधनः संस्कारो ज्ञानमित्युच्यते, ज्ञानसंस्कृतैरात्मप्रदेशैः पर्यायेण मनः सन्निकृष्यते । आत्ममनःसन्निकर्षात् स्मृतयोऽपि पर्यायेण भवन्तीति ? ॥ २५ ॥ न; अन्तःशरीरवृत्तित्वान्मनसः ॥ २६ ॥ सदेहस्यात्मनो मनसा संयोगो विपच्यमानकर्माशयसहितो जीवनमिष्यते । तत्रास्य प्राक् प्रायणादन्तःशरीरे वर्तमानस्य मनसः शरीराद् बहिर्ज्ञानसंस्कृतैरात्म- प्रदेशैः संयोगो नोपपद्यत इति ॥ २६ ॥ साध्यत्वादहेतुः ? ॥ २७ ॥ विपच्यमानकर्माशयमात्रं जीवनम्, एवं च सति साध्यमन्तःशरीरवृत्तित्वं मनस इति ॥ २७ ॥ स्मरतः शरीरधारणोपपत्तेरप्रतिषेधः ॥ २८ ॥ सुस्मूर्षया खल्वयं मनः प्रणिदधानः चिरादपि कञ्चिदर्थं स्मरति, स्मरतश्च शरीरधारणं दृश्यते । आत्ममनःसन्निकर्षजश्च प्रयत्नो द्विविधः—धारकः, प्रेरकश्च । निःसृते च शरीराद् बहिर्मनसि धारकस्य प्रयत्नस्याभावाद् गुरुत्वात् पतनं स्यात् शरीरस्य स्मरत इति ॥ २८ ॥ ज्ञानसाधन संस्कार 'ज्ञान' कहलाता है । ज्ञानसंस्कृत आत्मप्रदेशों से मन क्रमशः सन्निकृष्ट होता है ! इस पर्यायजनित आत्ममनःसन्निकर्ष से स्मृतियाँ भी पर्याय से ही होंगी ॥ २५ ॥ मन के अन्तःशरीरवृत्ति होने से ऐसा कहना युक्त नहीं ॥ २६ ॥ सदेह आत्मा से प्रारब्ध कर्मसहित मन का संयोग 'जीवन' कहलाता है । वहाँ, मृत्यु से पूर्व अन्तःशरीर में ही वर्तमान मन का शरीर से बाहर के आत्मप्रदेशों से संयोग उपपन्न नहीं होता ॥ २६ ॥ एकदेशी की शङ्का— उक्त जीवनलक्षण स्वयं साध्य होने से हेतु नहीं बन सकता ? ॥ २७ ॥ विपच्यमान कर्माशयमात्र ही 'जीवन' है—ऐसा मानने पर मन का अन्तःशरीर- वृत्तित्व प्रमाणों से साधनीय है, अतः वह सिद्ध नहीं है ? ॥ २७ ॥ स्मरण करनेवाले का शरीरधारणोपपादन होने से निषेध युक्त नहीं ॥ २८ ॥ स्मरण करने की इच्छा से यह मन प्रणिधान करता हुआ बहुत काल के बाद भी किसी विषय का स्मरण कर ही लेता है, और वैसे स्मरणकर्ता को शरीरधारण किये हुए भी देखते हैं । आत्ममनःसन्निकर्षज प्रयत्न दो प्रकार का होता है—१. शरीर का धारक तथा २. प्रेरक । यों, शरीर से बाहर मन के निकल जाने पर धारकप्रयत्नाभाव से स्मरण करते हुए शरीर का गुरुत्व के कारण पतन होने लगेगा ॥ २८ ॥