न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० हेतूपादानात् प्रतिषेद्धव्याभ्यनुज्ञा ॥ ४४ ॥ 'उत्पन्नापवर्गिणी बुद्धिः' इति प्रतिषेद्धव्यम्, तदेवाभ्यनुज्ञायते-'विद्युत्सम्पाते रूपाव्यक्तग्रहणवत्' इति । यत्राव्यक्तग्रहणं तत्रोत्पन्नापवर्गिणी बुद्धिरिति । ग्रहणे हेतुविकल्पाद् ग्रहणविकल्पः, न बुद्धिविकल्पात् । यदिदं क्वचिदव्यक्तं क्वचिद्व्यक्तं ग्रहणमयं विकल्पः, ग्रहणहेतुविकल्पात् । यत्रानवस्थितो ग्रहणहेतुः तत्राव्यक्तं ग्रहणम्, यत्रावस्थितस्तत्र व्यक्तम्, न तु बुद्धे- रवस्थानानवस्थानाभ्यामिति । कस्मात् ? अर्थग्रहणं हि बुद्धिः, यत्र तदर्थग्रहण- मव्यक्तं व्यक्तं वा बुद्धिः सेति । विशेषाग्रहणे च सामान्यग्रहणमात्रमव्यक्तग्रह- णम्, तत्र विषयान्तरे बुद्धयन्तरानुत्पत्तिः, निमित्ताभावात् । यत्र समानधर्म- युक्तश्च धर्मी गृह्यते विशेषधर्मयुक्तश्च, तद्व्यक्तं ग्रहणम् । यत्र तु विशेषेष्वगृह्य- माणे सामान्यग्रहणमात्रम्, तदव्यक्तं ग्रहणम् । समानधर्मयोगाच्च विशिष्टधर्म- योगो विषयान्तरम्, तत्र यत्तु ग्रहणं न भवति तद्ग्रहणनिमित्ताभावाद्, न बुद्धेर- नवस्थानादिति । यथाविषयं च ग्रहणं व्यक्तमेव । प्रत्यर्थनियतत्वाच्च बुद्धीनाम्-सामान्य- विषयं च ग्रहणं स्वविषयं प्रति व्यक्तम्, विशेषविषयं च ग्रहणं स्वविषयं प्रति हेतूपादान द्वारा प्रतिषेध्य की स्वीकृति देने से ॥ ४४ ॥ यहाँ 'बुद्धि उत्पाद-विनाशिनी है'—यह प्रतिषेध्य है, उसीको आप 'विद्युत्सम्पात में रूप के अव्यक्त ज्ञान की तरह' ऐसा उदाहरण देकर स्वीकृत कर रहे हैं ! जहाँ अव्यक्त ज्ञान होगा वहाँ बुद्धि के उत्पाद-विनाश मानने ही पड़ेंगे । ज्ञान के हेतुविकल्प से ज्ञानविकल्प है, न कि ज्ञानविकल्प से । यह जो कहीं अव्यक्त तथा कहीं व्यक्त ज्ञान होता है, वहाँ ज्ञानसम्बन्धी हेतुविकल्प कारण है। जहाँ ज्ञानहेतु कारण अस्थिर है, वहाँ अव्यक्त ज्ञान होगा, जहाँ ज्ञानहेतु कारण स्थिर है, वहाँ व्यक्त ज्ञान होगा । ज्ञान की स्थिति से कोई मतलब नहीं; क्योंकि अर्थ-ज्ञान ही बुद्धि है । अर्थ का व्यक्त या अव्यक्त ज्ञान हो वह सब 'बुद्धि' है । विशेष ज्ञान न होने पर सामान्य ज्ञानमात्र को 'अव्यक्त ज्ञान' कहते हैं । वहाँ निमित्त कारण न होने से विषयान्तरं की बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होती । जहाँ तुल्यधर्मा तथा विशेषधर्मा धर्मी गृहीत होता है, वह 'व्यक्त-ज्ञान' तथा जहाँ विशेष के अगृहीत होने पर सामान्य ज्ञानमात्र होता है वह 'अव्यक्त ज्ञान' कहलाता है । समानधर्म से युक्त होते हुए विशेष धर्म का सम्बन्ध होना 'विषयान्तर' कहलाता है । वहाँ जो ज्ञान नहीं होता वह ज्ञानहेतु के न होने से नहीं हो पाता, न कि बुद्धि के अनवस्थान से । जिसका विषय जैसा है उसका वैसा ही ज्ञान 'व्यक्त ज्ञान' कहलाता है । प्रत्येक ज्ञान के अपने अपने अर्थ में नियत होने से सामान्यविषयक ज्ञान अपने विषय के प्रति