न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० नवस्थानं ग्राह्यानवस्थानं च, प्रत्यर्थनियतत्वाद् बुद्धीनाम्, यावन्ति प्रदीपार्चींषि तावत्यो बुद्धय इति । दृश्यते चात्र व्यक्तं प्रदीपार्चिषां ग्रहणमिति ॥ ४५ ॥ बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाकरणम् [ ४६-५५ ] चेतना शरीरगुणः; सति शरीरे भावात्, असति चाभावादिति ?— द्रव्ये स्वगुणपरगुणोपलब्धेः संशयः ॥ ४६ ॥ सांशयिकः सति भावः। स्वगुणोऽप्सु द्रवत्वमुपलभ्यते, परगुणश्चोष्णता, तेनायं संशयः—किं शरीरगुणश्चेतना शरीरे गृह्यते, अथ द्रव्यान्तरगुण इति ? ॥ ४६ ॥ न शरीरगुणश्चेतना । कस्मात् ? यावच्छरीरभावित्वाद्रूपादीनाम् ॥ ४७ ॥ न रूपादिहीनं शरीरं गृह्यते, चेतनाहीनं तु गृह्यते; यथा—उष्णताहीना आपः, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतनेति । संस्कारवदिति चेद् ? न; करणानुच्छेदात् । यथाविधे द्रव्ये संस्कारः, तथाविध एवोपरमो न; तत्र कारणोच्छेदादत्यन्तं नियत होने से जितनी दीपक की किरणें होगी उतनी ही बुद्धियाँ होंगी । प्रदीप की किरणें यद्यपि अस्थिर हैं फिर भी उन से होनेवाला ज्ञान व्यक्त ही गृहीत होता है । अतः 'ज्ञान की अनवस्थायिता से अव्यक्त ज्ञान होता है'—ऐसा आप नहीं कह सकते ॥ ४५ ॥ चेतना शरीर का गुण है; क्योंकि वह शरीर के रहने पर रहती है, न रहने पर नहीं रहती ? द्रव्य में स्वगुण तथा परगुण—दोनों को उपलब्धि से यहां संशय है ॥ ४६ ॥ 'आश्रय के होने पर उसका गुण गृहीत होता है'—इसीसे चेतन विषय में कोई निश्चयात्मक ज्ञान नहीं हो पाता । जैसे जल में द्रवत्व स्वगुण भी उपलब्ध है, उष्णता पर- गुण ( तैजस ) भी है । अतः यह संशय होता है—क्या शरीर में गृहीत होनेवाली चेतना शरीर का गुण है या किसी द्रव्यान्तर का ॥ ४६ ॥ चेतना शरीरगुण नहीं है; क्योंकि रूपादि शरीरपर्यन्त ही रहते हैं ॥ ४७ ॥ शरीर रूपादिहीन गृहीत नहीं हो पाता, जब कि वह चेतनाहीन गृहीत होता देखा जाता है, जैसे उष्णताहीन जल । अतः चेतना शरीरगुण नहीं है । जैसे संस्कार शरीरगुण है, परन्तु वह शरीरपर्यन्त नहीं रहता, उसी तरह चेतना को भी शरीरगुण मान लें ? नहीं मान सकते; क्योंकि वहां कारण का नाश नहीं होने से उसका नाश नहीं होता । द्रव्य की जिस स्थिति में संस्कार होता है उस स्थिति में संस्कार का नाश नहीं होता, वहाँ कारणोच्छेद से संस्कारानुपपत्ति आत्यन्तिक होती है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri