भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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२५८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० यावत्सु द्रव्येषु पूर्वगुणप्रतिद्वन्द्विसिद्धिस्तावत्सु पाकजोत्पत्तिर्दृश्यते; पूर्वगुणैः सह पाकजानामवस्थानस्याग्रहणात् । न च शरीरे चेतनाप्रतिद्वन्द्विसिद्धौ सहानव- स्थायि गुणान्तरं गृह्यते, येनानुमीयेत तेन चेतनाया विरोधः । तस्मादप्रतिषिद्धा चेतना यावच्छरीरं वर्त्तेत ! न तु वर्त्तते, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतना इति ॥ ४९ ॥ २. इतश्च न शरीरगुणश्चेतना; शरीरव्यापित्वात् ॥ ५० ॥ शरीरं शरीरावयवाश्च सर्वे चेतनोत्पत्त्या व्याप्ता इति न क्वचिदनुत्पत्तिश्चे- तनायाः । शरीरवच्छरीरावयवाश्चेतना इति प्राप्तं चेतनबहुत्वम् । तत्र यथा प्रतिशरीरं चेतनबहुत्वं सुखदुःखज्ञानानां व्यवस्था लिङ्गम्, एवमेकशरीरेऽपि स्याद् । न तु भवति, तस्मान्न शरीरगुणश्चेतनेति ॥ ५० ॥ यदुक्तम्—न क्वचिच्छरीरावयवे चेतनाया अनुत्पत्तिरिति ? सा न; केशनखादिष्वनुपलब्धेः ? ॥ ५१ ॥ केशेषु नखादिषु चानुत्पत्तिश्चेतनाया इति अनुपपन्नं शरीरव्यापित्व- मिति ? ॥ ५१ ॥ जितने द्रव्यों में पूर्व गुण विरोधी गुण की उत्पत्ति होती हो उतने ही द्रव्यों में पाकज गुण की उत्पत्ति देखी जाती है; क्योंकि पूर्व गुणों के साथ पाकज गुणों का अवस्थान नहीं देखा जाता । चेतना में ऐसी बात नहीं है; क्योंकि शरीर में चेतनाप्रतिद्वन्द्वी की सिद्धि होती हो—ऐसा गुणान्तर गृहीत नहीं होता, जिस से कि चेतना के विरोध का अनुमान हो । विरोध न होने से चेतना को शरीर के स्थायितापर्यन्त रहना चाहिये, परन्तु रहती नहीं, अतः चेतना शरीरगुण नहीं है ॥ ४९ ॥ २. इस कारण भी चेतना शरीरगुण नहीं है; शरीरव्यापी होने से ॥ ५० ॥ शरीर तथा उसका प्रत्येक अवयव चेतनोत्पत्ति से व्याप्त है, क्योंकि उसमें शरीर के किसी भी भागमें चेतना की अनुत्पत्ति नहीं देखी जाती । तो जब शरीर की तरह शरीरावयव भी चेतन हैं तब आपको अनेक चेतन मानने पड़ेंगे । जैसे प्रत्येक शरीर में चेतन का पार्थक्य सुख-दुःख, ज्ञान आदि का व्यवस्थापक हेतु है, उसी तरह अब एक शरीर में भी चेतनबहुत्व होता हुआ सुखादि का व्यवस्थापक होने लगेगा, होता है नहीं; अतः मानना चाहिये कि चेतना शरीरगुण नहीं है ॥ ५० ॥ शंका—यह जो कहा था कि 'किसी भी शरीरावयव में चेतना का अनुत्पाद नहीं है' ? यह भी नहीं कह सकते; क्योंकि केशनखादि में चेतना उपलब्ध नहीं होती ? ॥ ५१ ॥ केश तथा नखादि में चेतना उपलब्ध नहीं होती, अतः चेतना का शरीरव्यापित्व सिद्ध नहीं होगा ॥ ५१ ॥