न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 288, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें२७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० कर्मविपाकसंवेदनं दर्शनमिति । तददृष्टकारितमिति कस्यचिद्दर्शनम्-अदृष्टं नाम परमाणूनां गुणविशेषः क्रियाहेतुः, तेन प्रेरिताः परमाणवः सम्मूर्च्छिताः शरीरमुत्पादयन्तीति ? तत्र मनः समाविशति स्वगुणेनादृष्टेन प्रेरितम् । समनस्के शरीरे द्रष्टुरुपलब्धिर्भवतीति ? एतस्मिन् वै दर्शने गुणानुच्छेदात् पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्गे । अपवर्गे शरीरो- त्पत्तिः परमाणुगुणस्यादृष्टस्यानुच्छेदत्वादिति ॥ ६८ ॥ मनःकर्मनिमित्तत्वाच्च संयोगानुच्छेदः ॥ ६९ ॥ मनोगुणेनादृष्टेन समावेशिते मनसि संयोगव्युच्छेदो न स्यात्, तत्र किंकृतं शरीरादपसर्पणं मनस इति ! कर्माशयक्षये तु कर्माशयान्तराद्विपच्य- मानादपसर्पणोपपत्तिरिति । अदृष्टादेवापसर्पणमिति चेत्-योऽदृष्टः शरीरोप- सर्पणहेतुः, स एवापसर्पणहेतुरपीति ? न; एकस्य जीवनप्रायणहेतुत्वानुपपत्तेः । एवं च सति एकमदृष्टं जीवनप्रायणयोर्हेतुरिति प्राप्तम्, नैतदुपपद्यते ॥ ६९ ॥ नित्यत्वप्रसङ्गश्च प्रायणानुपपत्तेः ॥ ७० ॥ विपाकसंवेदनात् कर्माशयक्षये शरीरपातः प्रायणम्, कर्माशयान्तराच्च जैनमतखण्डन— १. कुछ वादी कर्मविपाक संवेदन ( कर्मफलभोग ) को ( अदृष्टजन्य ) मानते हैं । वे उस 'अदृष्टकारित' का यो प्रतिपादन करते हैं—परमाणुओं का गुणविशेष 'अदृष्ट' है, वह क्रियाकारण है । उस कारण से इकट्ठे हुए पार्थिवादि परमाणु शरीर को उत्पन्न करते हैं, अदृष्ट स्वगुण से प्रेरित होकर मन उस शरीर में प्रविष्ट हो जाता है । उक्त सांख्याभिमत द्रष्टा के इस मनःसहित शरीर से दृश्योपलब्धि होती है ? इस मत में भी उक्त अदृष्ट गुणविशेष का उच्छेद न होने से, अपवर्गानन्तर भी शरीरोत्पाद हो ही सकता है, अतः यह मत भी सदोष है ॥ ६८ ॥ २. इसी मत में दूषणान्तर दिखाते हैं— मनःकर्मनिमित्त मानने पर उसका संयोगोच्छेद नहीं बनेगा ॥ ६९ ॥ अदृष्ट स्वगुण से प्रेरित मन जब एक बार शरीर में प्रविष्ट हो गया तो फिर वह उस शरीर से वियुक्त क्यों होगा, जबकि वैसा कोई कारण न हो ! 'कर्मनिमित्तक उत्पत्ति' सिद्धान्त में कर्म के क्षीण होने से वह मन उस शरीर से वियुक्त हो सकता है । यदि यह कहें कि उसी स्वगुण अदृष्ट से, जो संयोग कराता हैं, वियोग भी हो जायेगा ? तो यह नहीं कह सकते; क्योंकि एक ही कारण जीवन तथा मृत्यु का कारक नहीं बना करता, जबकि आप उस एक ही कारण को जीवन तथा मृत्यु का कारक बता रहे हैं ! अतः यह मत भी समीचीन नहीं ॥ ६९ ॥ विनाश ( मृत्यु ) न होने से शरीर में नित्यत्व-प्रसङ्ग होने लगेगा ॥ ७० ॥ विपाक ( कर्मफल ) के भोग से उस कर्माशय के क्षीण होने पर शरीरनाश (मृत्यु) हो जाता है, तथा अन्य कर्माशय होने पर 'जन्म' होता है । यदि कर्मनिरपेक्ष भूतमात्र