न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें५७. सू० ] दुःखपरीक्षाप्रकरणम् ३०३ निष्पत्तेः । निष्पद्यते खलु बाधनान्तरालेषु सुखं प्रत्यात्मवेदनीयं शरीरिणाम्, तदशक्यं प्रत्याख्यातुमिति ॥ ५६ ॥ अथापि— बाधनानिवृत्तेर्वेदयनः पर्येषणदोषादप्रतिषेधः ॥ ५७ ॥ सुखस्य दुःखोद्देशेनेति प्रकरणात्, पर्येषणम् = प्रार्थना विषयार्जनतृष्णा, पर्येषणस्य दोषो यदयं वेदयमानः प्रार्थयते, तच्चास्य प्रार्थितं न सम्पद्यते, सम्पद्य वा विपद्यते, न्यूनं वा सम्पद्यते, बहुप्रत्यनीकं वा सम्पद्यते—इत्येतस्मात् पर्येषण- दोषान्नानाविधो मानसः सन्तापो भवति । एवं वेदयतः पर्येषणदोषाद् बाधनाया अनिवृत्तिः । बाधनानिवृत्तेर्दुःखसंज्ञाभावनमुपदिश्यते । अनेन कारणेन दुःखं जन्म, न तु सुखस्याभावादिति । अथाप्येतदनूक्तम्— 'कामं कामयमानस्य यदा कामः समृध्यते । अथैनमपरः कामः क्षिप्रमेव प्रबाधते' ॥ "अपि चेदुदनेमिं समन्ताद् भूमिमिमां लभते१ सगवाश्वां न स तेन धनेन सुख की उत्पत्ति होती रहती है। दुःखों के बीच में सुख भी प्रत्येक प्राणी को अनुभूत होता रहता है । इस प्रत्यक्षगम्य सुखानुभव का कोई कैसे प्रत्याख्यान कर सकता है ! एक बात और— सुखानुभव करते हुए को तृष्णानुवर्तन होने के कारण दुःखनिवृत्ति न होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ५७ ॥ दुःखों का कीर्तन प्रकरण रहने से यहाँ पर्येषण सुखसम्बन्धी समझना चाहिये । पर्येषण से तात्पर्य है प्रार्थना, अर्थात् विषय को पाने की तृष्णा । इस तृष्णा में दोष यह है कि जब पुरुष किसी सुख का अनुभव करके उसे ( पुनः ) चाहता है, चाहने पर कभी वह सुख उसे मिल जाता है, कभी नहीं मिलता, या कभी मिलकर पुनः नष्ट हो जाता है, या यथेच्छ नहीं मिलता, या उसे बहुत से विघ्न आगे-पीछे घेर लेते हैं। इस तृष्णादोष से उस पुरुष को नाना प्रकार का मानसिक क्लेश होता है। इस रीति से, सुखानुभव करते हुए भी वह सुख तृष्णा से लिपटा रहता है । यतः दुःख एकान्ततः निवृत्त नहीं होता, अतः बाधा के रहने से दुःख पृथक् पदार्थ माना गया है, सुखाभाव नहीं । जैसा कि वृद्धजनों ने कहा भी है— विषय को जब यह चाहने लगता है तो इसकी यह चाह ( तृष्णा ) धीरे-धीरे बढ़ती जाती है, अतः यह एक चाह के पूरा होते ही दूसरी चाह को लेकर परेशान हो उठता है । उदाहरण के रूप में इस बात को ले सकते हैं—'गौ, अश्व-आदि साधनों सहित १. 'भूमिमालभते'—इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri