भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६०. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०७ जायमान इति गुणशब्दः; विपर्ययेऽनधिकारात् । 'जायमानो ह वै ब्राह्मणः' इति च शब्दः-गृहस्थः सम्पद्यमानो जायमान इति । यदायं गृहस्थो जायते तदा कर्मभिरधिक्रियते; मातृतो जायमानस्यानधिकारात् । यदा तु मातृतो जायते कुमारः, न तदा कर्मभिरधिक्रियते; अर्थिनः शक्तस्य चाधिकारात् । अर्थिनः कर्मभिरधिकारः; कर्मविधौ कामसंयोगस्मृतेः 'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्ग- कामः' इत्येवमादि । शक्तस्य च प्रवृत्तिसम्भवात्-शक्तस्य कर्मभिरधिकारः; प्रवृत्तिसम्भवात् । शक्तः खलु विहिते कर्मणि प्रवर्त्तते, नेतर इति । उभया- भावस्तु प्रधानशब्दार्थे । मातृतो जायमाने कुमारे उभयम्-अर्थिता, शक्तिश्च न भवतीति । न भिद्यते च लौकिकाद् वाक्याद्वैदिकं वाक्यं प्रेक्षापूर्वककारिपुरुषप्रणीतत्वेन । तत्र लौकिकस्तावदपरीक्षकोऽपि न जातमात्रं कुमारकमेवं ब्रूयात्-अधीष्व, यजस्व, ब्रह्मचर्यं चरेति, कुत एष ऋषिरुपपन्नानवद्यवादी उपदेशार्थेन प्रयुक्त उप- दिशति ! न खलु वै नर्त्तकोऽन्धेषु प्रवर्त्तते, न गायको बधिरेष्विति । उपदिष्टार्था- इसी तरह 'जायमानो ह वै ब्राह्मणः' इस श्रुति में 'जायमान' भी गुणशब्द है; क्योंकि इस शब्द के प्रधान अर्थ 'जातमात्र' को यागाद्यनुष्ठान का अधिकार ही प्राप्त नहीं है । मन्त्र में 'जायमान' शब्द का अर्थ है गृहस्थ होता हुआ, गृहस्थ बनता हुआ । अर्थात् जब यह ब्राह्मण गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होता है तब उसको यज्ञादि कर्मों में अधिकार प्राप्त होता है । माता से उत्पन्न होते ही ब्राह्मण-शिशु को उन कर्मों में अधिकार प्राप्त नहीं है । जब यह शिशु माता से उत्पन्न होता है तभी से इसका अधिकार इसलिए नहीं होता कि उस यज्ञ कर्म में .अर्थी तथा तत्कर्मानुष्ठानसमर्थ ही अधिकारी होता है । अर्थी को अधिकारी मानने का कारण यह है कि यज्ञों द्वारा अपने लिए कुछ चाहने वाला ही यज्ञ करे-ऐसा विधिरूप श्रुतिवाक्य में कामसंयुक्त वचन है, जैसे-'स्वर्गकाम अग्निहोत्र हवन करे'। सामर्थ्यवान् पुरुष ही उन कर्मों का अधिकारी है, क्योंकि समर्थ ही पूर्ण यज्ञों को कर पाता है । समर्थ ही विहित कर्म में प्रवृत्त हो सकता है, असमर्थ नहीं । 'जातमात्र' इस प्रधान शब्द के अर्थ में 'अर्थित्व' तथा 'शक्तत्व' दोनों का ही अभाव है । अर्थात् माता से उत्पन्न होते हुए शिशु में न अर्थित्व ( किसी पुत्रादि वस्तु की चाह) रहती है, न शक्ति (यज्ञ करने की सामर्थ्य) ही । बुद्धिमान् पुरुष द्वारा प्रणीत लौकिक वाक्य से वैदिक वाक्य भी भिन्न (निरर्थक) नहीं है । जैसे लोक में उत्पन्न होते हुए बालक को कोई बुद्धिमान् यह उपदेश नहीं दे सकता कि, 'पढ़ो, यज्ञ करो, ब्रह्मचर्य पालन करो', तो ये हित-मित-सत्यवादी ऋषि उपदेशानर्ह शिशु को ऐसा उपदेश कैसे कर सकते हैं ! क्या नर्तक अन्धों की अपना नाच दिखायेगा, या कोई गायक बहरों को अपना गाना सुनायेगा ! उपदेश उसी को किया जाता