न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 410 में से
संदर्भ में पढ़ें४. सू० प्रमाणप्रकरणम् १७ च प्रत्यक्षत उपलभ्यते । व्यवस्था पुनः—'अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामः' इति । लौकिकस्य स्वर्गे न लिङ्गदर्शनम्, न प्रत्यक्षम् । स्तनयित्नुशब्दे श्रूयमाणे शब्द- हेतोरनुमानम्; तत्र न प्रत्यक्षम्, नागमः । पाणौ प्रत्यक्षत उपलभ्यमाने नानुमानम्, नागम इति । सा चेयं प्रमितिः प्रत्यक्षपरा । जिज्ञासितमर्थमाप्तोपदेशात् प्रतिपद्यमानो लिङ्गदर्शनेनापि बुभुत्सते, लिङ्गदर्शनानुमितं च प्रत्यक्षतो दिदृक्षते, प्रत्यक्षत१ उपलब्धेऽर्थे जिज्ञासा निवर्त्तते । पूर्वोक्तमुदाहरणम्—'अग्निः' इति । प्रमातुः प्रमातव्येऽर्थे१ प्रमाणानां २सम्भवोऽभिसम्प्लवः, असम्भवो३ व्यवस्थेति ॥ ३ ॥ इति त्रिसूत्रीभाष्यम् ( क ) प्रत्यक्षलक्षणम् अथ विभक्तानां लक्षणमिति । इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम् ॥ ४ ॥ है, जैसे—'स्वर्ग चाहनेवाला अग्निहोत्र करे' यह शब्द प्रमाण है, यहाँ लौकिकों को अनु- मान और प्रत्यक्ष से ज्ञान नहीं होता । मेघ की गर्जना सुनने पर ध्वनिहेतुक अनुमान ही होता है, न कि प्रत्यक्ष, या शाब्द । हस्तस्थ आमलक के लिए न अनुमान की जरूरत हैं, न शब्द की । प्रमिति में प्रत्यक्ष प्रधान होता है । जिज्ञासित अर्थ को आप्तोपदेश द्वारा समझकर, हेतुदर्शन से समझने की कोशिश करता हैं, उससे समझकर उसे प्रत्यक्ष देखना चाहता है, प्रत्यक्ष देखकर उपलब्ध अर्थ में ( उसकी ) जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है । इसे समझने के लिए पहला ही उदाहरण रखिए—'अग्नि' । प्रमाता के प्रमातव्य अर्थ में अनेक प्रमाणों का साङ्कर्य 'अभिसम्प्लव' कहलाता है, तथा उनके असाङ्कर्य को 'व्यवस्था' कहते हैं ॥ ३ ॥ त्रिसूत्री-भाष्यानुवाद समाप्त प्रमाणों का विभाग दिखा दिया, अब उन विभक्तों में से प्रत्येक का लक्षण कर रहे हैं— इन्द्रिय का अर्थ के साथ सम्बन्ध होने से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है, जो कि अशाब्द हो, व्यभिचारशून्य हो तथा विशेष्यविशेषणभावावगाही हो ॥ ४ ॥ १. क्वचिन्नास्ति । २. 'सङ्करः'—इति पाठ० । ३. 'असङ्करः'—इति पाठ० । न्या० द०CC-३. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri