भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३३. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३३ स्वप्नविषयाभिमानवदयं प्रमाणप्रमेयाभिमानः ? ॥ ३१ ॥ मायागन्धर्वनगरमृगतृष्णिकावद्वा ? ॥ ३२ ॥ यथा स्वप्ने न विषयाः सन्त्यथ चाभिमानो भवति, एवं न प्रमाणानि प्रमे- यानि च सन्त्यथ च प्रमाणप्रमेयाभिमानो भवति ? ॥ ३१-३२ ॥ हेत्वभावादसिद्धिः ॥ ३३ ॥ स्वप्नान्ते विषयाभिमानवत् प्रमाणप्रमेयाभिमानो न पुनर्जागरितान्ते विषयो- पलब्धिवदित्यत्र हेतुर्नास्तीति हेत्वभावादसिद्धिः । स्वप्नान्ते चासन्तो विषया उपलभ्यन्ते इत्यत्रापि हेत्वभावः । प्रतिबोधेऽनुपलम्भादिति चेत् ? प्रतिबोधविषयोपलम्भादप्रतिषेधः । यदि प्रतिबोधेऽनुपलम्भात् स्वप्ने विषया न सन्तीति ? र्तिह य इमे प्रतिबुद्धेन विषया उपलभ्यन्ते उपलम्भात् सन्तीति । विपर्यये हि हेतुसामर्थ्यम् । उपलम्भात्सद्भावे सत्यनुपलम्भादभावः सिद्ध्यति, उभयथा त्वभावे नानुपलम्भस्य सामर्थ्यमस्ति, यथा-प्रदीपस्याभावादरूपस्यादर्शन- मिति, तत्र भावेनाभावः समर्थ्यते इति । [ विज्ञानवादी फिर दूसरे रूप से बात उठाते हैं— ] यह प्रमाण-प्रमेय का अभिमान ( कल्पना ) स्वप्नविषय के अभिमान ( मिथ्या कल्पना ) की तरह है ? ॥ ३१ ॥ या कल्पित गन्धर्वनगर या मृगतृष्णा की तरह ( मिथ्या ) है ? ॥ ३२ ॥ जैसे स्वप्न में विषय वास्तविक नहीं अपितु कल्पित ही होते हैं, उसी तरह ये प्रमाण तथा प्रमेय दोनों ही नहीं हैं, केवल इनकी कल्पना कर ली गयी है ? ॥ ३१-३२ ॥ उक्त अभिमानकल्पना में हेतु न होने से वह असिद्ध है ॥ ३३ ॥ यह प्रमाण-प्रमेयबुद्धि स्वप्नप्रत्ययसदृशी है, जाग्रत्प्रत्ययसदृशी नहीं है—इसमें कोई हेतु नहीं, अतः हेत्वभाव से आपकी बात अयुक्त ही है। स्वप्नावस्था में गृहीत होनेवाले विषय नहीं हैं—इसमें भी कोई हेतु नहीं। यदि यह कहो कि जागने पर वे उपलब्ध नहीं होते अतः वे नहीं हैं ? तो जाग्रद- वस्था में तो वे उपलब्ध रहते ही हैं। तब 'जाग्रदवस्था में विषय नहीं हैं'—यह कैसे कहते हो ! हेतुसामर्थ्य से तभी कोई बात सिद्ध की जा सकती है कि जब वह कहीं अन्यत्र देखी गयी हो। अन्यत्र क्वचित् उपलब्धि से सत्ता सिद्ध होने पर ही अनुपलब्धि से उसका अभाव सिद्ध हो सकता है। जब उभयथा अभाव ही है तो अनुपलब्धिसामर्थ्य से आप क्या सिद्ध करेंगे ! जैसे किसी जगह प्रदीप के अभाव में रूप ( घटादि ) का अदर्शन सिद्ध करना है तो प्रमाता को अन्यत्र कहीं रूपदर्शन हुआ रहना चाहिये, उसी सामर्थ्य से वह कह सकता है कि 'प्रदीप नहीं है, अतः रूपादर्शन हैं' । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri