भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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पृष्ठ 362

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अथ पञ्चमोऽध्यायः प्रथममाह्निकम् [ १-३ ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् [ १-३ ] 'साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानस्य विकल्पाज्जातिबहुत्वम्' ( १.२.१८ ), इति संक्षेपेणोक्तम्, तद्विस्तरेण विभज्यते । ताः खल्विमा जातयः, स्थापना- हेतौ प्रयुक्ते, चतुर्विंशतिः प्रतिषेधहेतवः- साधर्म्यवैधर्म्योत्कर्षापकर्षवर्ण्यावर्ण्यविकल्पसाध्यप्राप्त्यप्राप्तिप्रसङ्गप्रति- दृष्टान्तानुत्पत्तिसंशयप्रकरणहेत्वर्थापत्त्यविशेषोपपत्त्युपलब्ध्यनुप- लब्धिनित्यानित्यकार्यसमाः ॥ १ ॥ साधर्म्येण प्रत्यवस्थानमविशिष्यमाणं स्थापनाहेतुतः साधर्म्यसमः । अविशेषं तत्र तत्रोदाहरिष्यामः । एवं वैधर्म्यसमप्रभृतयोऽपि निर्वक्तव्याः ॥ १ ॥ [ इस न्यायशास्त्र के प्रथमाध्यायस्थ प्रथम सूत्र में शास्त्रान्तःपाति विषयों का परि- गणन कर, तदनन्तर गत चारों अध्यायों में क्रमशः उन सबके उद्देश, लक्षण तथा परीक्षा की जा चुकी, अब क्या बाकी रह गया कि जिसके लिए यह पञ्चम अध्याय प्रारम्भ किया जा रहा है ? —इस पर भाष्यकार प्रसंग उठाते हैं—] "साधर्म्य तथा विरुद्ध धर्म से किये जाने वाले खण्डन को 'जाति' ( असत् उत्तर ) कहते हैं, तथा उसके भेद से जाति के बहुत भेद हैं"—ऐसा हम संक्षेप से पीछे ( १.२.१८ ) कह चुके हैं। अब उसी का विस्तरशः निरूपण किया जा रहा है । ये जातियाँ, जो कि वादी द्वारा स्थापनाहेतु उपस्थित किये जाने पर प्रतिवादी द्वारा उसके खण्डन के लिए काम में लायी जाती हैं, चौबीस प्रकार की होती हैं, जैसे— १. साधर्म्यसम, २. वैधर्म्यसम, ३. उत्कर्षसम, ४. अपकर्षसम, ५. वर्ण्यसम, ६. अवर्ण्यसम, ७. विकल्पसम, ८. साध्यसम, ९. प्राप्तिसम, १०. अप्राप्तिसम, ११. प्रसङ्गसम, १२. प्रतिदृष्टान्तसम, १३, अनुत्पत्तिसम, १४. संशयसम, १५. प्रकरणसम, १६. हेतुसम, १७. अर्थापत्तिसम, १८. अविशेषसम, १९. उपपत्तिसम, २०. उपलब्धि- सम, २१. अनुपलब्धिसम, २२. नित्यसम, २३. अनित्यसम, तथा २४. कार्यसम ॥ १ ॥ साधर्म्य ही से जिसका निषेध किया जा सकता हो, अर्थात् दोनों पक्ष के लिए समान हो, किसी एक पक्ष में प्रबल युक्ति न मिलती हो उसे 'साधर्म्यसम' कहते हैं । यह 'अविशेष' ( समानता ) आगे के उस उस जाति के उदाहरण में ही बताया जायेगा कि कहाँ क्या समानता है ! इसी तरह 'वैधर्म्यसम' आदि अवशिष्ट शब्दों का भी निर्वचन कर लेना चाहिये ॥१॥