न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८. सू० ] प्राप्त्यप्राप्तिसमजातिद्वयप्रकरणम् ३४९ साध्यातिदेशाच्च दृष्टान्तोपपत्तेः ॥ ६ ॥ यत्र लौकिकपरीक्षकाणां बुद्धिसाम्यं तेनाविपरीतोऽर्थोऽतिदिश्यते प्रज्ञाप- नार्थम् । एवं साध्यातिदेशाद् दृष्टान्ते उपपद्यमाने साध्यत्वमनुपपन्नमिति ॥ ६ ॥ प्राप्त्यप्राप्तिसमजातिद्वयप्रकरणम् [ ७-८ ] प्राप्य साध्यमप्राप्य वा हेतोः प्राप्त्याऽविशिष्टत्वादप्राप्त्याऽसाधकत्वाच्च प्राप्त्यप्राप्तिसमौ ॥ ७ ॥ हेतुः प्राप्य वा साधयेत्, अप्राप्य वा ? न तावत् प्राप्य; प्राप्त्यामविशिष्टत्वा- दसाधकः । द्वयोर्विद्यमानयोः प्राप्तौ सत्यां किं कस्य साधकं साध्यं वा ! अप्राप्य साधकं न भवति, नाप्राप्तः प्रदीपः प्रकाशयतीति । प्राप्त्या प्रत्यवस्थानं प्राप्तिसमः, अप्राप्त्या प्रत्यवस्थानमप्राप्तिसमः ॥ ७ ॥ अनयोत्तरम्— घटादिनिष्पत्तिदर्शनात् पीडने चाभिचारादप्रतिषेधः ॥ ८ ॥ साध्य के अतिदेश ( सादृश्य ) से दृष्टान्त की उपपत्ति हो जाती है ॥ ६ ॥ जहाँ साधारण तथा परीक्षक जनों का बुद्धिसाम्य हो उससे अनुकूल अर्थ अति- दिष्ट होता है । क्योंकि लोगों को समझना है । परन्तु साध्यसादृश्य से दृष्टान्त के उपपन्न किये जाने पर 'साध्यत्व' ही उसका क्या रहेगा ! ॥ ६ ॥ [ अब 'प्राप्तिसम' तथा 'अप्राप्तिसम' का लक्षण करते हैं—] प्राप्ति में विशेषता न होने से, हेतु से साध्य को प्राप्त कर या न प्राप्त कर प्राप्ति या अप्राप्ति द्वारा असाधक होने से 'प्राप्ति सम' तथा 'अप्राप्तिसम' दोष कहलाते हैं ॥ ७ ॥ हेतु साध्य से मिलकर ( संयुक्त होकर ) उसको सिद्ध करता है ? अथवा बिना मिले ? यदि मिल कर सिद्ध करता है तो दोनों में किसी एक की विशेषता न होने से कौन सिद्ध करता है, तथा कौन सिद्ध होता है—इसकी कुछ व्यवस्था न रहेगी ! अर्थात् प्राप्ति से उनमें साध्यसाधकभाव नहीं रह सकता । यदि बिना संयुक्त हुए सिद्ध करता है—यह मानोगे, तो भी साध्यसिद्धि न हो सकेगी । दीपक उसी वस्तु को प्रकाशित करता है, जिससे वह संयुक्त हो । जिस वस्तु का उसके प्रकाश से संयोग न हो उसे सिद्ध नहीं कर पाता । यों प्राप्ति से प्रतिषेध को 'प्राप्तिसम' तथा अप्राप्ति से प्रति- षेध को 'अप्राप्तिसम' कहते हैं ॥ ७ ॥ इन दोनों का समाधान यह है— घटादि की निष्पत्ति तथा पीड़न में अभिचार देखे जाने से उक्त प्रतिषेध युक्त नहीं ॥ ८ ॥