न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० व्यवसायात्मकमिति¹ । न चैतन्मन्तव्यम्—आत्ममनःसन्निकर्षजमेवानवधारण- ज्ञानमिति । चक्षुषा ह्ययमर्थं पश्यन्नावधारयति । यथा चेन्द्रियेणोपलब्धमर्थं मनसोपलभते, एवमिन्द्रियेणानवधारयन्मनसा नावधारयति । यच्चैतदिन्द्रिया- नवधारणपूर्वकं मनसाऽनवधारणं तद्विशेषापेक्षं विमर्शमात्रं संशयः, न पूर्वमिति । सर्वत्र प्रत्यक्षविषये ज्ञातुरिन्द्रियेण व्यवसायः, पश्चान्मनसाऽनुव्यवसायः; उप- हतेन्द्रियाणामनुव्यवसायाभावादिति । आत्मादिषु सुखादिषु च प्रत्यक्षलक्षणं वक्तव्यम् अनिन्द्रियार्थसन्निकर्षजं हि तदिति ? इन्द्रियस्य वै सतो मनस इन्द्रियेभ्यः पृथगुपदेशः, धर्मभेदात् । भौतिकानीन्द्रियाणि नियतविषयाणि, सगुणानां चैषामिन्द्रियभाव इति; मनस्त्वभौतिकं सर्वविषयं च, नास्य सगुणस्येन्द्रियभाव इति । सति चेन्द्रियार्थसन्निकर्षे सन्निधिरसन्निधि चास्य युगपज्ज्ञानानुपत्तिकारणं वक्ष्यामः ( १. १. १६ ) इति । मनसश्चेन्द्रियभावात्तन्न वाच्यं लक्षगान्तरमिति । अतः लक्षण में एक और व्यावर्तक शब्द लगाते हैं—'व्यवसायात्मक' । और यह नहीं मान लेना चाहिये कि संशयज्ञान आत्ममनःसन्निकर्षोत्पन्न ही होता है, आंखों से भी प्रमाता विषय को देखता हुआ वहाँ संशय कर सकता है । प्रमाता जैसे इन्द्रिय से उपलब्ध विषय (अर्थ) को मन से ग्रहण करता है, वैसे इन्द्रिय से अर्थ का अवधारण नहीं होता तो मन से भी अवधारण नहीं होगा । इसलिये यह इन्द्रियकृत-संशयपूर्वक मन का संशय एक विशिष्ट संशय है, जिसे हम विमर्शमात्र कह सकते हैं, आपका सोचा हुआ पहले वाला (साधारण) संशय नहीं । प्रत्यक्ष के बारे में सर्वत्र यही देखा जाता है कि पहले ज्ञाता को इन्द्रिय का व्यवसाय होता है, फिर मन से उसका अनुव्यवसाय (ज्ञानानन्तर निश्चयात्मक ज्ञान)। विकलेन्द्रिय पुरुषों में अनुव्यवसाय उपलब्ध न होने से हमें यही पद्धति माननी पड़ेगी। शङ्का—तब तो आत्मा और सुख आदि के बारे में एक और विशिष्ट प्रत्यक्ष लक्षण करना पड़ेगा; क्योंकि उनका ज्ञान इन्द्रियार्थसन्निकर्षज नहीं, अपितु मनःसन्निकर्षज है ? कहते हैं—मन के इन्द्रिय होते हुए भी उसका इन्द्रियों से पृथक् उपदेश धर्मभेद से किया गया है; क्योंकि अन्य भौतिक इन्द्रियाँ तो नियतविषय हैं, वे अपने-अपने गन्धादि गुण से बाह्य गन्धादि का बोध कराती हैं; पर मन ऐसा नहीं है, वह अभौतिक है, सर्व- विषय है । इसको सगुण मान कर इन्द्रियत्व नहीं कहा गया । इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष होने पर भी युगपत् ज्ञान नहीं होता—इसमें हम मन की सन्निधि या असन्निधि को कारण आगे चल कर (१.१.१६) बतायेंगे । मन को इन्द्रिय मानने से आत्मा तथा सुखादि ज्ञान के लिये लक्ष्णान्तर की आवश्यकता नहीं । अन्य तन्त्रों में मन को भी इन्द्रिय माना गया है, १. तथा च 'कल्पनापोढमभ्रान्तम्' इति बौद्धाचार्यैः सम्मतं लक्षणमेव सूत्रभाष्ययो- रपि सम्मतमिति तदक्षरतात्पर्यम् ।