भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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४३. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६९ विशेषात् पुनरुक्तदोषप्रसङ्गः । चतुर्थपक्षे समानदोषत्वं परस्योच्यते-प्रतिषेध- विप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद्दोष इति; षष्ठेऽपि परपक्षाभ्युपगमात् समानो दोष इति समानदोषत्वमेवोच्यते, नार्थविशेषः कश्चिदस्ति । समानस्तुतीयपञ्चमयोः पुरुक्तदोषप्रसङ्गः । तृतीयपक्षेऽपि 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इति समानत्व- मभ्युपगम्यते । पञ्चमपक्षेऽपि प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गोऽभ्यु- गम्यते, नार्थविशेषः कश्चिदुच्यत इति । तत्र पञ्चमषष्ठपक्षयोः अर्थाविशेषात् पुनरुक्तदोषः, तृतीयचतुर्थयोर्मतानुज्ञा, प्रथमद्वितीययोर्विशेषहेत्वभाव इति— षट्पक्ष्यामुभयोरसिद्धिः । कदा षट्पक्षी ? यदा 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इत्येवं प्रवर्त्तते, तदोभयोः पक्षयोरसिद्धिः। यदा तु 'कार्यान्यत्वे प्रयत्नाहेतुत्वमनुपलब्धिकारणोपपत्तेः' इत्यनेन तृतीयपक्षो युज्यते, तदा विशेषहेतुवचनात् 'प्रयत्नानन्तरमात्मलाभः शब्दस्य नाभिव्यक्तिः' इति सिद्धः प्रथमपक्षः, न षट्पक्षी प्रवर्त्तत इति ॥ ४३ ॥ इति श्रीवात्स्यायनीये न्यायभाष्ये पञ्चमाध्यायस्याद्यमाह्निकम् ० पर चतुर्थ तथा षष्ठ पक्ष में अर्थ भिन्न न होने से पुनरुक्त दोष है; क्योंकि चतुर्थ पक्ष में प्रतिषेध के खण्डन में 'प्रतिषेध दोष की तरह दोष ही हैं'—ऐसा कहकर दूसरे को समानदोष दिया जाता है, तथा षष्ठ पक्ष में भी 'परपक्ष की स्वीकृति से समान दोष ही ही हैं'—ऐसा कहने से समानदोषत्व के अतिरिक्त कोई नयी बात नहीं कही गयी । इसी प्रकार तृतीय तथा पञ्चम पक्ष में भी पुनरुक्त दोष ही है । तृतीय पक्ष में 'प्रतिषेध में भी समान दोष हैं' ऐसा कहने से समानत्व ही कहा जा रहा है, तथा पञ्चमपक्ष में भी प्रतिषेध के खण्डन में समानदोष-प्रसङ्ग स्वीकार किया जा रहा है, कोई नयी बात नहीं कही जा रही । इस प्रकार पञ्चम तथा षष्ठ पक्ष में भिन्न अर्थ न होने से पुनरुक्त दोष है, तृतीय तथा चतुर्थ में मतानुज्ञा है, प्रथम तथा द्वितीय में विशेषहेत्वभाव है—यों इस षट्पक्षी में वादी, प्रतिवादी दोनों में से किसी के भी पक्ष की सिद्धि ( तत्त्वनिर्णय ) नहीं होगी । यह षट्पक्षी कब होती है ? जब 'प्रतिषेध में समान दोष हैं'—ऐसा कहा जाता हैं, तब दोनों ही पक्षों की असिद्धि है । किन्तु जब 'कार्यान्यत्व में प्रयत्नाहेतुत्व अनुपलब्धि- कारणोपपादन से सिद्ध हैं'—ऐसा तीसरा पक्ष रखा जाता है तब विशेषहेतु-वचन से शब्द का प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होना ही सिद्ध होता है, न कि अभिव्यक्ति । यों प्रथम पक्ष ही सिद्ध है—ऐसा तत्त्वनिर्णय हो जाता है । तब यह षट्पक्षी प्रवृत्त नहीं होती ॥ ४३ ॥ वात्स्यायनीय न्यायभाष्य(सहित न्यायदर्शन) में पञ्चमाध्याय का प्रथमाह्निक समाप्त ० न्या० द० ८-२४