भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३७४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० पदं च नामाख्यातोपसर्गनिपाताः, अभिधेयस्य क्रियान्तरयोगाद्विशिष्यमाणरूपः शब्दो नाम१, क्रियाकारक समुदायः, कारकसङ्ख्याविशिष्टक्रियाकालयोगाभि- धाय्याख्यातम्, धात्वर्थमात्रं च कालाभिधानविशिष्टम्, प्रयोगेष्वर्थादभिद्य- मानरूपा निपाताः, उपसृज्यमानाः क्रियाद्योतका उपसर्गा इत्येवमादि— तदर्थान्तरं वेदितव्यमिति ॥ ७ ॥ वर्णक्रमनिर्देशवन्निरर्थकम् ॥ ८ ॥ यथा 'नित्यः शब्दः कचटतपाः, जबगडदशत्वात्, झभञ्घढधषवत्' इति । एवम्प्रकारं निरर्थकम् । अभिधानाभिधेयभावानुपपत्तौ अर्थगतेरभावाद् वर्णा एवं क्रमेण निर्दिश्यन्त इति ॥ ८ ॥ परिषत्प्रतिवादिभ्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञातमविज्ञातार्थम् ॥ ९ ॥ यद्वाक्यं परिषदा प्रतिवादिना च त्रिरभिहितमपि न विज्ञायते श्लिष्ट- ( स्वा० ११, पाणिनीय धातु२) इस धातु से 'कमिमनिजनिगाभायाहिभ्यश्च' इस कृदन्त ( उणादि ) सूत्र से 'तु' प्रत्यय होकर निष्पन्न हुआ है । पद चार प्रकार के होते हैं—१. नाम, २. आख्यात ( तिङन्त ), ३. उपसर्ग, तथा ४. निपात । अभिधेय के क्रियान्तर- सम्बन्ध होने पर विशिष्यमाण रूप 'शब्द' नाम कहलाता है । क्रियाकारक समुदाय या कारक एवं संख्याविशिष्ट क्रिया-कालसम्बन्ध को बतलाने वाला 'आख्यात' कहलाता है । उसमें केवल धात्वर्थ कालाभिधानविशिष्ट होता है । 'निपात' प्रयोगों में अर्थों से अभिद्यमान रूप होते हैं । धातु के समीप में पहले प्रयुक्त होनेवाले 'उपसर्ग' कहलाते हैं । इत्यादि अर्थान्तर जानना चाहिये । यह अर्थान्तरनिग्रहस्थान—वादी, प्रतिवादी— दोनों को ही हो सकता है ॥ ७ ॥ वर्णक्रमनिर्देश की तरह अवाचक-प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है ॥ ८ ॥ जैसे—'कचटतप शब्द नित्य है, ज ब ग ड द श होने से, झ भ ञ घ ढ ध ष' की तरह, इस प्रकार का अवाचक प्रयोग 'निरर्थक' कहलाता है । अभिधानाभिधेय की अनुपपत्ति होने से अर्थबोध नहीं होगा—ऐसा मानकर यहाँ वर्ण का ही क्रमशः निर्देश गया है । इसी तरह भाषानभिज्ञ वादी को अपनी भाषा में हेतु देना भी 'निरर्थक' निग्रह- स्थान है ॥ ८ ॥ परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार कहने पर भी यदि न समझ पावे तो उसे 'अविज्ञातार्थ' निग्रहस्थान कहते हैं ॥ ९ ॥ जो वाक्य परिषत् तथा प्रतिवादी द्वारा तीन बार बोलने पर भी न समझ में आवे. क्योंकि या तो वह वाक्य श्लिष्टपद हो, जैसे—श्वेत दौड़ता है'; या अप्रतीत प्रयोग हो, १. 'यथा वृक्षस्तिष्ठति, वृक्षं च्छिनत्तीति भिन्नक्रियायोगाद्विशिष्यमाणरूपो वृक्ष- शब्दः'—इति तात्पर्याचार्याः । २. द्र०—माधवीया धातुवृत्तिः अस्मत्सम्पादिता ।