न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० दृष्टम्—व्रज्यापूर्वकमन्यत्र दृष्टस्यान्यत्र दर्शनमिति, तथा चाऽऽदित्यस्य; तस्मादस्त्यप्रत्यक्षाप्यादित्यस्य व्रज्येति । अथ वा—पूर्ववदिति, यत्र यथापूर्वं प्रत्यक्षभूतयोरन्यतरदर्शनेनान्यतर- स्याप्रत्यक्षस्यानुमानम्, यथा—धूमेनाऽग्निरिति । शेषवन्नाम—परिशेषः, स च प्रसक्तप्रतिषेधेऽन्यत्राप्रसङ्गाच्छिष्यमाणे सम्प्रत्ययः, यथा—'सदनित्यम्' एवमा- दिना द्रव्यगुणकर्मणामविशेषेण सामान्यविशेषसमवायेभ्यो विभक्तस्य शब्दस्य तस्मिन् द्रव्यगुणकर्मगुणसंशये—'न द्रव्यम्, एकद्रव्यत्वात्; न, कर्म, शब्दान्तर- हेतुत्वात्; यस्तु शिष्यते सोऽयम्' इति शब्दस्य गुणत्वप्रतिपत्तिः । सामान्यतोदृष्टं नाम—यत्राप्रत्यक्षे लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धे केनचिदर्थेन लिङ्गस्य सामान्याद- प्रत्यक्षो लिङ्गी गम्यते, यथा—इच्छादिभिरात्मा, 'इच्छादयो गुणाः, गुणाश्च द्रव्यसंस्थानाः, तद्यदेषां स्थानं स आत्मा' इति । विभागवचनादेव त्रिविधमिति सिद्धे त्रिविधवचनं महतो महाविषयस्य न्यायस्य लघीयसा सूत्रेणोपदेशात् परं वाक्यलाघवं मन्यमानस्यान्त्यस्मिन् होता है। जैसे—सूर्य को प्रातः पूर्व में देखा गया और सायंकाल पश्चिम में देखा गया तो अनुमान हुआ 'सूर्य में गति है।' 'अथ वा' से उक्त तीनों पदों का अन्य प्रकार से व्याख्यान का उपक्रम करते हैं— पूर्ववत् उसे कहते हैं जहाँ पहले दोनों का प्रत्यक्ष हो चुका हो परन्तु अब लिङ्ग-लिङ्गी में किसी एक को देख कर दूसरे का अनुमान किया जाय, जैसे—धूम से वह्नि का । शेषवत् उसे कहते हैं जो परिशेष ( बाकी बचा ) रह जाये । वह है सम्भाव्यमानों में से कुछ का प्रतिषेध कर देने पर बाकी बचे हुओं में कहीं भी सम्भाव्यमान न होने से उक्त प्रतिषेध के बाद अवशिष्ट का ज्ञान । जैसे—'शब्द सत् है, अनित्य भी है' ऐसा निश्चय हो जाने के बाद सन्देह होता है कि हम शब्द को क्या मानें—द्रव्य, गुण या कर्म ? तब 'शब्द द्रव्य नहीं हैं एक द्रव्य में समवेत होने से', 'शब्द कर्म भी नहीं है, शब्दान्तर का हेतु होने से' इन हेतुओं द्वारा शब्द में द्रव्यत्व तथा कर्मत्व का प्रतिषेध हो गया, बाकी बच गया गुण, अतः वहाँ अनुमान होता है—'शब्द गुण हैं' । सामान्यतोदृष्ट वह होता हैं जहाँ लिङ्ग और लिङ्गी दोनों के ही सम्बन्ध अप्रत्यक्ष हों, परन्तु किसी अर्थविशेष से लिङ्ग के साधारण्य द्वारा लिङ्गी का ज्ञान हो जाये । जैसे—इच्छादि से आत्मा का 'इच्छादि गुण हैं, गुण द्रव्य में रहते हैं, अतः ये इच्छादि जिसमें रहें वही आत्मा हैं'— यह अनुमान । विभाग कर देने से अनुमान का त्रैविध्य ज्ञात हो ही जाता, फिर सूत्र में 'त्रिविधम्' यह पद क्यों दिया ? अतिगम्भीर इस महान् न्यायशास्त्र का छोटे-छोटे सूत्रों से उपदेश करके ही आचार्य ने लाघव कर दिखाया, फिर इन छोटे-छोटे वाक्यों में भी और लाघव CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri