भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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१५ सू० ] प्रमेयप्रकरणम् ३१ विरुद्धमर्थं प्रत्याचक्षाणक इवेदमाह— बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरम् ॥ १५ ॥ नाचेतनस्य करणस्य बुद्धेर्ज्ञानं भवितुमर्हति । तद्धि चेतनं स्यात्, एकश्चायं चेतनो देहेन्द्रियसङ्घातव्यतिरिक्त इति ? प्रमेयलक्षणार्थस्य वाक्य- स्यान्यार्थप्रकाशन'मुपपत्तिसामर्थ्यादिति ॥ १५ ॥ (च) मनोल्क्षणम् स्मृत्यनुमानागमसंशयप्रतिभास्वप्नज्ञानोहाः सुखादिप्रत्यक्षमच्छादयश्च मनसो लिङ्गानि । तेषु सत्स्वयमपि— १ प्रकाशित होती है तथा अचेतन, अकर्ता पुरुष की उपलब्धि प्रकाशित करती है'—ऐसा साङ्ख्यकार का मत है, यहाँ अचेतन बुद्धि का व्यापार ज्ञान तथा वह भी अकर्ता चेतन को उपलब्ध कराना—यह युक्तिविरुद्ध बात है । इसी का खण्डन करते हुए सूत्रकार कहते हैं— बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान—ये अनर्थान्तर (पर्याय) हैं। (इन पर्यायों से जो पदार्थ कहा जाये वह 'बुद्धि' है) ॥१५॥ पुरुषगत चैतन्य के अपरिणामी होने से उसकी छाया बुद्धि में नहीं पड़ सकती, अतः बुद्धि में ही चैतन्य मानना पड़ेगा। यदि ऐसा है तो ज्ञान के प्रति बुद्धि और पुरुष- चेतनद्वय का व्यापार अपेक्षित है, केवल बुद्धि से ज्ञान नहीं होगा; जब कि देहेन्द्रिय- संघात से अतिरिक्त एक ही चेतन माना गया है ? उपपत्तिसामर्थ्य से इस प्रमेयलक्षणार्थक वाक्य (सूत्र) का दूसरे (साङ्ख्यकार) के मत-खण्डन में भी तात्पर्य है। [ पर्याय शब्द कह देने मात्र से लक्षणाभिधान नहीं हुआ—ऐसा कुछ लोग कह सकते हैं, उनको यही उत्तर देना चाहिये कि लोक में दो तरह से पदाभिधान होता है, कुछ पद प्रतिव्यक्ति संकेतित किये जाते हैं, जैसे—पिता अपने पुत्रों का अलग-अलग नामकरण करता है; या अनेक व्यक्ति को सामान्यतः एक नाम दे दिया जाता है, जैसे— गौ आदि । दूसरे प्रकार में अभिधेय के लिए केवल पर्याय से कह देना भी अभिधेय-ज्ञान के लिए पर्याप्त होता है, लक्षणकरण का यह भी प्रयोजन है। प्रकृत में उपलब्धि तथा ज्ञान का अर्थ सर्वप्रसिद्ध है, इसलिये उन्हें बुद्धि का पर्याय कह देने से बुद्धि स्वरूप ज्ञात हो जाता है। इस युक्ति से बुद्धि का लक्षण भी बता दिया गया है ] ॥ १५ ॥ स्मृति, अनुमान, आगम, संशय, प्रतिभा, स्वप्न, ज्ञान, ऊह, सुख-आदि का प्रत्यक्ष, तथा इच्छा-आदि ये मन के लक्षण हैं; इनके साथ-साथ यह भी है कि— १. सांख्यमतनिराकरणरूपम् ।