भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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४२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० उपलब्धिव्यवस्थातः खल्वपि । सच्चोदकमुपलभ्यते तडागादिषु, मरीचिषु चाविद्यमानमुदकमिति; अतः क्वचिदुपलभ्यमाने तत्त्वव्यवस्थापकस्य प्रमाण- स्यानुपलब्धेः—‘किं सदुपलभ्यते, अथासत्’ इति संशयो भवति । अनुपलब्ध्यव्यवस्थातः । सच्च नोपलभ्यते मूलकीलकोदकादि, असच्चा- नुत्पन्नं निरुद्धं वा; ततः क्वचिदनुपलभ्यमाने संशयः—‘किं सन्नोपलभ्यते, उता- सत्’ इति संशयो भवति । विशेषापेक्षा पूर्ववत् । पूर्वः समानोऽनेकश्च धर्मो ज्ञेयस्थः, उपलब्ध्द्यनुपलब्धी पुनर्जातृस्थे—एतावता विशेषेण पुनर्वचनम् । समानधर्माधिगमात् समानधर्मोपपत्तेर्विशेषस्मृत्यपेक्षो विमर्श इति॥ २३ ॥ प्रयोजनलक्षणम् स्थानवतां लक्षणमिति समानम् । ४. उपलब्धि की अव्यवस्था से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । जैसे— तालाब आदि में जल है, और मिल जाता है, तथा मृगमरीचिका में जल नहीं है, परन्तु भान होता है । इसलिये कहीं उपलब्धि होने पर तत्त्वनिर्णायक प्रमाण की उपलब्धि न होने से 'क्या सत् ही मिलता है या असत् भी मिल जाता है'—ऐसा विमर्श भी 'संशय' होता है । ५. अनुपलब्धि की अव्यवस्था से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । सत् भी कभी कभी नहीं मिलता, जैसे—मन्त्रादि से कीलित या वस्त्रादि से आच्छादित जल । असत् तो मिलेगा ही क्या ! असत् द्विविध स्थिति में होता है—१. अनुत्पन्न या २. किसी उपाय से छिपा हुआ । तब कहीं अनुपलब्धि होने पर संशय होता है कि क्या सत् उप- लब्ध नहीं होता है, या असत् उपलब्ध नहीं होता ? यहाँ 'विशेषापेक्षा' का व्याख्यान पहले लक्षण की तरह ही समझ लेना चाहिये । 'संशय' के इन पाँच हेतुओं में से प्रथम और द्वितीय ('समान....' और 'अनेक....') ज्ञेय में घटेंगे तथा तथा चतुर्थ और पंचम ('उपलब्धि....' 'अनुपलब्धि....') ज्ञाता में । इसी भेद को बताने के लिये ये पुनः कहे गये हैं । "समानधर्म के अधिगम से, समानधर्म की उपपत्ति से विशेष स्मृत्यपेक्षावान् विमर्श 'संशय' कहलाता है"—यह संशय का निष्कृष्ट लक्षण है ॥ २३ ॥ क्रमशः अवसर आने पर ही 'प्रयोजन' का लक्षण-कथन अभीष्ट था, अब उसका अवसर आ गया है । १. अत्र वार्त्तिककारः—'समानधर्मोपपत्तेः, अनेकधर्मोपपत्ते', विप्रतिपत्तेश्च त्रिविध एव संशयः' इत्याह । विस्तरस्तु तत एवावगन्तव्यः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri