भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३०. सू० ] सिद्धान्तलक्षणप्रकरणम् ४५ तासाम्— सर्वतन्त्राविरुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः ॥ २८ ॥ यथा घ्राणादीनीन्द्रियाणि, गन्धादय इन्द्रियार्थाः, पृथिव्यादीनि भूतानि, प्रमाणैरर्थस्य ग्रहणमिति ॥ २८ ॥ ४। समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रासिद्धः प्रतितन्त्रसिद्धान्तः ॥ २९ ॥ यथा—नासतः आत्मलाभः, न सतः आत्महानम्, निरतिशयाश्चेतनाः, देहेन्द्रियमनःसु विषयेषु तत्तत्कारणेषु च विशेषः—इति साङ्ख्यानाम्। पुरुषकर्मादिनिमित्तो भूतसर्गः, कर्महेतवो दोषाः, प्रवृत्तिश्च, स्वगुणविशिष्टा- श्चेतनाः, असदुत्पद्यते उत्पन्नं निरुध्यते—इति योगानाम्¹ ॥ २९ ॥ यत्सिद्धावन्यप्रकरणसिद्धिः सोऽधिकरणसिद्धान्तः ॥ ३० ॥ उन सिद्धान्तों में— अन्य तन्त्रों से सम्मत तथा स्वतन्त्र प्रतिपादित अर्थ 'सर्वतन्त्रसिद्धान्त' कहलाता है ॥२८॥ जैसे—'घ्राणादिक इन्द्रिय हैं', 'गन्धादि इन्द्रियों के विषय हैं', 'पृथिवी आदि महाभूत हैं', 'प्रमाण से अर्थ का ग्रहण होता है'—ये सिद्धान्त सभी तन्त्रों में समानतया गृहीत हैं, अतः इन्हें 'सर्वतन्त्रसिद्धान्त' कहा जाता है ॥ २८ ॥ समान (स्वमतानुयायी) तन्त्र में स्वीकृत तथा विरोधी अन्य तन्त्र में अस्वीकृत अर्थ 'प्रतितन्त्रसिद्धान्त' कहलाता है ॥ २९ ॥ 'असत् की उपलब्धि नहीं हो सकती, सत् का क्षय नहीं हो सकता' 'चेतन अपरि- णामी है, किसी धर्म से युक्त नहीं होता'; 'देह, इन्द्रिय, मन आदि स्थूल विषय तथा तत्कारण महत्, अहङ्कार, पञ्च तन्मात्रा, पञ्च महाभूत आदि सूक्ष्म विषयों में विशेष अतिशय रहता है' इत्यादि सांख्यतन्त्र के सिद्धान्त हैं । 'भूतसृष्टि पुरुषकर्मनिमित्तक है', प्रवृत्ति तथा दोष कर्महेतु हैं', 'चेतन स्वगुणविशिष्ट है', 'असत् उत्पन्न होता है' 'उत्पन्न विनष्ट होता है'—ये नैयायिकों के सिद्धान्त हैं। ये उभयविध सिद्धान्त सांख्य तथा नैयायिकों के लिये परस्पर 'प्रतितन्त्रसिद्धान्त' हुए ॥ २९ ॥ जिसके सिद्ध होने पर अन्य प्रकरण (साथ लगे अर्थ) की स्वतः सिद्धि हो जाये, वह 'अधिकरणसिद्धान्त' कहलाता है ॥ ३० ॥ १. वैशेषिकाणाम्—इति केचित् । तत्त्वतस्तु योगशब्देनात्र नैयायिका एवाभिप्रेताः । एतस्मिन्नेवार्थेऽस्य प्रयोगो बहुत्रोपलभ्यते प्राचीनग्रन्थेषु ।