भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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३२. सू० ] न्यायप्रकरणम् ४७ न्यायप्रकरणम् [ ३२-३९ ] अथावयवाः । प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः ॥ ३२ ॥ दशावयवानेके नैयायिका वाक्ये सञ्चक्षते-जिज्ञासा, संशयः, शक्यप्राप्तिः, प्रयोजनम्, संशयव्युदास इति, ते कस्मान्नोच्यन्त इति ? तत्राप्रतीयमानेऽर्थे प्रत्ययार्थस्य प्रर्वतिका जिज्ञासा । अप्रतीयमानमर्थं कस्मा- ज्जिज्ञासते ? 'तं तत्त्वतो ज्ञातं हास्यामि वा, उपादास्ये वा, उपेक्षिष्ये वा' इति। ता एता हानोपादानोपेक्षाबुद्धयस्तत्त्वज्ञानस्यार्थः, तदर्थमयं जिज्ञासते । सा खल्वियम- साधनमर्थस्येति । जिज्ञासाधिष्ठानं संशयश्च व्याहतधर्मोपसङ्घातात् तत्त्वज्ञाने प्रत्यासन्नः, व्याहतयोर्हि धर्मयोरन्यतरत्तत्त्वं भवितुमर्हतीति । स पृथगुपदिष्टोऽ- प्यासाधनमर्थस्येति । प्रमातुः प्रमाणानि प्रमेयाधिगमार्थानि, सा शक्यप्राप्तिर्न साधकस्य वाक्यस्य भागेन युज्यते प्रतिज्ञादिवदिति । प्रयोजनं तत्त्वावधारण- मर्थसाधकस्य वाक्यस्य फलम्, नैकदेश इति । संशयव्युदासः प्रतिपक्षोपवर्णनम्, अब अवयवों का वर्णन करते हैं- प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निगमन-न्याय वाक्य के ये ( पाँच ) अवयव हैं ॥ ३२ ॥ कुछ नैयायिक न्याय वाक्य के दश अवयव मानते हैं, जिनमें पाँच तो ऊपर गिना ही दिये गये हैं, इनके अतिरिक्त पाँच ये हैं-१. जिज्ञासा, २. संशय, ३. शक्यप्राप्ति, ४. प्रयोजन तथा ५. संशयनाश; सूत्र में ये अतिरिक्त पाँच भी क्यों नहीं कहे गये ? 'जिज्ञासा' अप्रतीयमान अर्थ में प्रत्यय होने के लिये प्रवर्त्तिका होती है, अप्रतीयमान अर्थ की इसलिए जिज्ञासा होती है कि उसे तत्त्वतः जान कर छोड़ दूँगा, या ग्रहण कर लूँगा या उपेक्षा कर दूँगा। ये हान, उपादान, उपेक्षा बुद्धियाँ तत्त्वज्ञान से होती हैं, तत्त्वज्ञान के लिए 'जिज्ञासा' काम आती है। यह किसी अर्थ की साधिका नहीं हैं, अतः पञ्चावयवों में इसका परिगणन निरर्थक है। क्योंकि जिज्ञासाधिष्ठान 'संशय' में दो विरुद्ध धर्मों का उपसंघात होता है, अतः यह तत्त्वज्ञान के लिये प्रत्यासन्न है, विरुद्ध धर्म में से अन्यतर होना चाहिए केवल इतना समझता है, इसीलिए इसका प्रमेयों में पाठ करके भी पञ्चावयवों में इसे नहीं पढा, क्योंकि यह भी अर्थसाधक कोटि में नहीं आता। प्रमाता के प्रमाण प्रमेयप्राप्त्यर्थक हैं'- यह 'शक्यप्राप्ति' साधक वाक्य में प्रतिज्ञा की तरह अवयवरूप से प्रयुक्त नहीं होती। तत्त्वावधारण को 'प्रयोजन' कहते हैं, यह अर्थ- साधक वाक्य का फल हो सकता है, अवयव नहीं। इसी तरह 'संशयव्युदास' भी तत्त्वा- भ्यनुज्ञा के लिये उपयुक्त है, क्योंकि प्रतिपक्षोपवर्णन का निषेधक है, जो तत्त्वज्ञान में सहायक हो सकता है, अर्थसाधक वाक्य का एकदेश नहीं बन सकता । [नैयायिक भद्रबाहु 'संशय', 'संशयव्युदास' के स्थान पर 'आशङ्काप्रतिषेध' का परिगणन करते हैं, उनका

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