न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० यन्तीति, छलजातिनिग्रहस्थानोपालम्भो जल्प इत्येवमप्युच्यमाने विज्ञायत एतदिति ? प्रमाणैः साधनोपालम्भयोश्छलजातिनिग्रहस्थानानामङ्गभावः, स्वपक्ष- रक्षणार्थत्वात्, न स्वतन्त्राणां साधनभावः। यत्तत्प्रमाणैरर्थस्य साधनं तत्र छलजातिनिग्रहस्थानानामङ्गभावः, स्वपक्षरक्षणार्थत्वात् । तानि हि प्रयुज्य- मानानि परपक्षविघातेन स्वपक्षं रक्षन्ति । तथा चोक्तम्—'तत्त्वाध्यवसायसंरक्ष- णार्थं जल्पवितण्डे, बीजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखावरणवत्' (४. २. ५० ) इति । यश्चासौ प्रमाणैः प्रतिपक्षस्योपालम्भस्तस्य चैतानि प्रयुज्यमानानि प्रति- षेधविघातात् सहकारिणि भवन्ति । तदेवमङ्गीभूतानां छलादीनामुपादानं जल्पे, न स्वतन्त्राणां साधनभावः । उपालम्भे तु स्वातन्त्र्यमप्यस्तीति ॥ २ ॥ वितण्डलक्षणम् स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा ॥ ३ ॥ स जल्पो वितण्डा भवति । किंविशेषणः ? प्रतिपक्षस्थापनाया हीनः । यौ तौ समानाधिकरणौ विरुद्धौ धर्मौ पक्षप्रतिपक्षावित्युक्तम्, तयोरेकतरं वैतण्डिको न स्थापयतीति, परपक्षप्रतिषेधेनैव प्रवर्त्तत इति । 'छलजातिनिग्रहस्थानोपालम्भ ही जल्प होता है' इतना लक्षण करने से भी यह बात ज्ञात हो जाती ? उ० प्रमाणों द्वारा स्वपक्षस्थापन तथा परपक्षप्रतिषेध में ये तीनों सहायक हैं; क्योंकि ये तीनों ही स्वपक्षरक्षण करते हैं। हाँ, ये स्वातन्त्र्येण कोई अर्थसिद्धि नहीं करते, अपितु प्रमाणों द्वारा की जा रही अर्थसिद्धि में स्वपक्षरक्षण-कार्य द्वारा सहायक होते हैं । इनका प्रयोग किया जाये तो परपक्ष-खण्डन द्वारा भी स्वपक्षरक्षण करते हैं। इसीलिये आगे कहा है—'जल्प, वितण्डा का प्रयोग तत्त्वाध्यवसाय-संरक्षण के लिये होता है, जैसे छोटे- छोटे पौधों की रक्षा के लिये उनके चारों ओर कांटेदार झाड़ी लगा दी जाती है' (४. २. ५०)। प्रमाणों द्वारा प्रतिपक्ष के निषेध में वादी द्वारा प्रयुक्त हुए ये तीनों अपने प्रतिषेधविघातक कार्य द्वारा सहायक होते हैं । अतः निष्कर्ष यह निकला कि जल्प में स्वपक्षस्थापना के लिये छलादि का ग्रहण 'अर्थसाधन के सहायक' रूप में होता है, न कि स्वतन्त्रतया । हाँ, परपक्षप्रतिषेध में ये स्वतन्त्र रूप से भी प्रयुक्त हो सकते हैं ॥ २ ॥ उपर्युक्त जल्प जब प्रतिपक्षस्थापनाहीन होता है तो 'वितण्डा' कहलाता है ॥ ३ ॥ वह जल्प 'वितण्डा' भी हो सकता है। कब ? जब वह प्रतिपक्ष-स्थापना से रहित हो । हम अनुपद में ही एकाधिकरणक दो विरुद्ध धर्मों को 'पक्ष-प्रतिपक्ष' कह आये हैं (१. २. १), यह वितण्डावादी उनमें से एक की भी स्थापना करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेता, केवल परपक्षखण्डन में ही लगा रहता है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri