न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४ . वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १ . अ० २ . आ० श्चाणुर्नित्यश्चेति । आत्मादौ च दृष्टान्ते-'उदाहरणसाधर्म्यात्साध्यसाधनं हेतुः' ( १. १. ३४ ) इति अस्पर्शत्वादिति हेतुर्नित्यत्वं व्यभिचरति—'अस्पर्शा बुद्धिर- नित्या च' इति । एवं द्विविधेऽपि दृष्टान्ते व्यभिचारात्साध्यसाधनभावो नास्तीति लक्षणाभावादहेतुरिति । नित्यत्वमप्येकोऽन्तः, अनित्यत्वमप्येकोऽन्तः, एकस्मिन्नन्ते विद्यत इति ऐकान्तिकः, विपर्ययादनैकान्तिकः, १उभयान्तव्यापकत्वादिति ॥ ५ ॥ (ख) विरुद्धलक्षणम् सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः ॥ ६ ॥ तं विरुणद्धीति तद्विरोधी, अभ्युपेतं सिद्धान्तं व्याहन्तीति । यथा—'सोऽयं विकारो व्यक्तेरपैति नित्यत्वप्रतिषेधात्', न नित्यो विकार उपपद्यते । 'अपैतोऽपि विकारोऽस्ति, विनाशप्रतिषेधात्' । सोऽयं नित्यत्वप्रतिषेधादिति हेतुर्व्यक्तेर- पैतोऽपि विकारोऽस्तीत्यनेन स्वसिद्धान्तेन विरुध्यते । कथम् ? व्यक्तिः = आत्म- लाभः, अपायः = प्रच्युतिः; यद्यात्मलाभात् प्रच्युतो विकारोऽस्ति ? नित्यत्वप्रति- षेधो नोपपद्यते । यद्व्यक्तेरपेतस्यापि विकारस्यास्तित्वं तत् खलु नित्यत्वमिति । जाता; क्योंकि स्पर्शवान् भी अणु और नित्य हो सकता है। आत्मा-आदि दृष्टान्तस्थ “उदाहरणसादृश्य से साध्य का साधक 'हेतु' है” ( १ . १ . ३४ )—इस हेतुलक्षण से 'अस्पर्शत्व' हेतु नित्यत्व से व्यभिचरित होगा; क्योंकि बुद्धि अस्पर्शवती होती हुई भी अनित्य है। इस प्रकार दोनों ही तरह के दृष्टान्तों में साध्यसाधनभाव न होने से हेतु- लक्षण नहीं घट पायेगा, अतः वह हेतु नहीं बन सकता । यहाँ नित्यत्व एक अन्त है, अनित्यत्व भी एक अन्त है। एक अन्त (अधिकरण) में साध्यसाधनभाव रहे अतः 'ऐकान्तिक' हेतु कहते हैं। इसके विपरीत 'अनैकान्तिक' कह- लाता है; क्योंकि वह दोनों अन्तों में व्याप्त रहता है ॥ ५ ॥ जो हेतु अभ्युपगतार्थ का विरोधी हो वह 'विरुद्ध' हेत्वाभास कहलाता है ॥ ६ ॥ उसका जो विरोध करे वह हुआ 'तद्विरोधी' अर्थात् जो प्रतिज्ञा तथा हेतु से प्रकाशित सिद्धान्त का विरोध करे। जैसे साङ्ख्यकार का मत है—'परिणामाख्य कार्य अभिव्यक्त स्वरूप से विश्लिष्ट हो जाता है, अनित्य होने से', 'अभिव्यक्तिरहित वह परिणामाख्य कार्य रहता भी है, स्वरूपहानि न होने से'; यहाँ 'विकार नित्य उपपन्न नहीं होता' यह हेतु 'व्यक्ति से असंश्लिष्ट होकर भी विकार रहता है, स्वरूप-हानि न हो ने से' इस स्वसिद्धान्त से विरुद्ध पड़ता है। कैसे? 'व्यक्ति' कहते हैं आत्मलाभ को, 'प्रच्युति' कहते हैं असंश्लेष को। उसमें नित्यत्वप्रतिषेध उपपन्न नहीं है, क्योंकि आत्मसत्ता से अलग होकर भी विकार १. 'उभयत्र'—इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri