भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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९. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६७ भाग आवृयते तस्य तस्यासन्निधिरेवाविच्छिन्नो गृह्यत इति । आवरणं तु प्राप्तिप्रतिषेधः ॥ ८ ॥ (ङ) कालातीतलक्षणम् कालात्ययापदिष्टः कालातीतः ॥ ९ ॥ कालात्ययेन युक्तो यस्यार्थैकदेशोऽपदिश्यमानस्य स कालात्ययापदिष्टः 'कालातीतः' इत्युच्यते । निदर्शनम्—'नित्यः शब्दः संयोगव्यंग्यत्वाद् रूपवत्' । प्रागूर्ध्वं च व्यक्तेरवस्थितं रूपं प्रदीपघटसंयोगेन व्यज्यते । तथा च शब्दोऽप्यव- स्थितो भेरीदण्डसंयोगेन व्यज्यते, दारुपरशुसंयोगेन वा । तस्मात्संयोगव्यंग्यत्वात् 'नित्यः शब्दः' इत्ययमहेतुः, कालात्ययापदेशात् । व्यञ्जकस्य संयोगस्य कालं न व्यङ्ग्यस्य रूपस्य व्यक्तिरत्येति । सति प्रदीपघटसंयोगे रूपस्य ग्रहणं भवति, न निवृत्ते संयोगे रूपं गृह्यते । निवृत्ते दारुपरशुसंयोगे दूरस्थेन शब्दः श्रूयते विभागकाले, सेयं शब्दस्य व्यक्तिः संयोगकालमत्येतीति न संयोगनिमित्ता भवति । कस्मात् ? कारणाभावाद्धि कार्याभाव इति । एवमुदाहरणसाधर्म्य- स्याभावादसाधनमयं हेतुर्हेत्वाभास इति । है ! चलते हुए द्रव्य से तेज का जो जो भाग ढक जाता है उससे उस तेज की अविच्छिन्न असन्निधि ही तो 'छाया' कहलाती है । आवरण से तात्पर्य है प्राप्ति-प्रतिषेध ॥ ८ ॥ जिस प्रयुज्यमान हेतु का एकदेश कालात्यय से युक्त हो वह 'कालातीत' हेत्वा- भास कहलाता है ॥ ९ ॥ जिस अर्थानुमान में प्रयुज्यमान हेतु का एकदेश कालात्यय से युक्त हो वह काला- त्ययापदिष्ट 'कालातीत' कहलाता है । उदाहरण—'शब्द नित्य है, संयोगव्यङ्ग्य होने से, रूप की तरह' । जैसे पहले या पीछे घट व्यक्ति में रहा हुआ रूप प्रदीपघट-संयोग से व्यक्त हो जाता है, इसी तरह निहित (अव्यक्त) शब्द भेरीदण्डसंयोग से या कुठार और काष्ठ के संयोग से व्यक्त हो जाता है; अतः 'संयोगव्यङ्ग्य होने से शब्द नित्य हैं' में 'संयोगव्यङ्ग्य' यह हेतु नहीं बनेगा; क्योंकि यहाँ कालात्ययापदेश है । व्यङ्ग्य रूप की अभिव्यक्ति व्यञ्जक संयोग के काल को अतिक्रान्त नहीं करती । घटप्रदीपसंयोग होने पर ही रूप की अभिव्यक्ति होती है, संयोग के निवृत्त होने पर नहीं हो पाती; परन्तु (हेतुवाक्यावयव में) भेरीदण्ड-संयोग के निवृत्त होने पर दूरस्थ शब्द संयोगाभाव काल में सुनायी देता है, यों यह शब्द की अभिव्यक्ति संयोगकाल को अतिक्रान्त कर जाती है । अतः यह संयोगोत्पन्न नहीं कही जा सकती; सिद्धान्त यह है—कारणाभाव से कार्याभाव होता है । इस नय से यह हेतु उदाहरणसादृश्य न मिलने से साध्य का साधक नही बन सकता, अतः यह हेत्वाभास है । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri