न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयोऽध्यायः [ प्रथमाह्निकम् ] अत ऊर्ध्वं प्रमाणादिपरीक्षा । सा च ‘विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः’ ( १. १. ४१ ) इत्यग्रे विमर्श एव परीक्ष्यते— संशयपरीक्षाप्रकरणम् [ १-७ ] [ पूर्वपक्षः ] समानानेकधर्माध्यवसायादन्यतरधर्माध्यवसायाद्वा न संशयः ॥ १ ॥ समानस्य धर्मस्याध्यवसात्संशयः, न धर्ममात्रात् । अथ वा—‘समानमनयोर्धर्ममुपलभे’ इति धर्मधर्मिग्रहणे संशयाभाव इति । अथ वा—समानधर्माध्यवसायादर्थान्तरभूते धर्मिणि संशयोऽनुपपन्नः, न जातु रूपस्यार्थान्तरभूतस्याध्यवसायादर्थान्तरभूते स्पर्शे संशय इति । अथ वा—नाध्यवसायादर्थावधारणादनवधारणज्ञानं संशय उपपद्यते, कार्य- कारणयोः सारूप्याभावादिति । एतेनानेकधर्माध्यवसायादिति व्याख्यातम् । अन्यतरधर्माध्यवसायाच्च संशयो न भवति, ततो ह्यन्यतरावधारणमेवेति ॥ १ ॥ अब आगे प्रमाणादि की लक्षणानुसारो परीक्षा की जायेगी । उस परीक्षा में “संशय करके पक्ष-प्रतिपक्ष द्वारा अर्थ का निश्चय ही ‘निर्णय’ कहलाता है” ( १. १. ४१ ) इस लक्षण से परीक्षा में संशय का प्रथम स्थान है, अतः सर्वप्रथम संशय पर ही विचार करते हैं— समान धर्म के अध्यवसाय से, अनेक धर्मों के अध्यवसाय से तथा अन्यतर धर्म के अध्यवसाय से संशय नहीं होता ॥ १ ॥ समान धर्म के अध्यवसाय से संशय होता है, धर्ममात्र के अज्ञायमान रहते संशय नहीं होता । अथवा धर्म-धर्मिग्रहण में—‘इस दोनों के समान धर्म उपलब्ध हैं’ इतने से भी संशय नहीं कहला सकता । अथवा—समान धर्माध्यवसाय से अर्थान्तरभूत धर्मी में संशय नहीं बन सकता; क्योंकि यह कभी नहीं होता कि अर्थान्तरभूत ‘रूप’ के अध्यवसाय से अर्थान्तरभूत ‘स्पर्श’ में संशय होने लगे । अथवा—अर्थावधारणात्मक अध्यवसाय से अनवधारणज्ञानरूप संशय नहीं हो सकता; क्योंकि कार्यकारण की सरूपता नहीं मिलती । जैसे अवधारण निश्चय है, संशय ज्ञान है । इसी तरह ‘अनेक धर्म के अध्यवसाय से’ इस वाक्य का व्याख्यान भी समझना चाहिये । अन्यतर धर्माध्यवसाय से भी संशय नहीं होता, बल्कि उससे अन्यतरावधारण ही होता है ॥ १ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri