भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६. सू०] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ७९ आकाङ्क्षा, सा चानुपलभ्यमाने विशेषे समर्था । न चोक्तम्—समानधर्मापेक्ष इति । समाने च धर्मे कथमाकाङ्क्षा न भवेद्, यद्ययं प्रत्यक्षः स्यात् । एतेन सामर्थ्येन विज्ञायते—समानधर्माध्यवसायादिति । उपपत्तिवचनाद्वा । समानधर्मोपपत्तेरित्युच्यते, न चान्या सद्भावसंवेद- नादृते समानधर्मोपपत्तिरस्ति । अनुपलभ्यमानसद्भावो हि समानो धर्मो- ऽविद्यमानवद्भवतीति । विषयशब्देन वा विषयिणः प्रत्ययस्याभिधानम् । यथा लोके 'धूमेनाग्नि- रनुमीयते, इत्युक्ते 'धूमदर्शनेनाग्निरनुमीयते' इति ज्ञायते । कथम् ? दृष्ट्वा हि धूममथाग्निमनुमिनोति, नादृष्टे । न च वाक्ये दर्शनशब्दः श्रूयते, अनुजानाति च वाक्यस्यार्थप्रत्यायकत्वम्, तेन मन्यामहे—विषयशब्देन विषयिणः प्रत्ययस्या- भिधानं बोद्धाऽनुजानाति । एवमिहापि समानधर्मशब्देन समानधर्माध्यवसाय- माहेति । यथोहित्वा—'समानमनयोर्धर्ममुपलभे' इति धर्मधर्मिग्रहणे संशयाभावः इति ? पूर्वदृष्टविषयमेतत् । 'यावहमर्थाँ पूर्वमद्राक्षं तयोः समानं धर्ममुपलभे, होता है। यहाँ विशेष ( विभेदक ) की अपेक्षा अर्थात् आकांक्षा यह 'विशेषापेक्ष' का अर्थ है। यह आकांक्षा विभेदक के अनुपलब्ध होने पर ही हो सकती है। अतएव 'समानधर्मापेक्ष' हमने नहीं कहा; क्योंकि समान धर्म होने मात्र से आकांक्षा कैसे नहीं होगी ? यदि यह प्रत्यक्ष हो । अतः समानधर्माध्यवसाय सामर्थ्यसिद्ध है । 'उपपत्ति' वचन से भी पूर्वपक्षी की आपत्ति निराकृत हो सकती है। समानधर्म की उपपत्ति से—ऐसा कहा गया है, क्योंकि सद्भावसंवेदन (स्वसत्ताक ज्ञान) के अतिरिक्त अन्य समानधर्मोपपत्ति क्या होगी ! अनुपलभ्यमान सत्ता वाले समानधर्म को तो न रहने के समान ही समझा जाता है। अथवा—विषयवाचक (समानधर्म) शब्द से विषयिणी प्रतीति का ज्ञान भी कहा जाता है। जैसे—लोक में 'धूम से अग्नि का अनुमान होता है,' ऐसा कहने पर 'धूम- दर्शन से अग्नि का अनुमान कर सकता है, बिना देखे नहीं । प्रयुक्त वाक्य में 'दर्शन' शब्द होता नहीं फिर भी वाक्य ने अर्थ का ज्ञान करा दिया—आप भी ऐसा मानते हैं, इससे यह सिद्ध होता है कि 'विषयवाचक शब्द से विषयक प्रत्यय का ज्ञान होता है'। इसी प्रकार उक्त वाक्य में इसी नय से 'समानधर्म' शब्द से 'समानधर्माध्यवसाय' कहा गया है। और जैसा कि पूर्वपक्षी ने तर्क करके कहा था—'इन दोनों के समान धर्मों को मैं पा रहा हूँ' ऐसे धर्म-धर्मी के ज्ञान में संशय नहीं होता, क्योंकि यह पूर्वदृष्ट है; जैसे 'मैंने जिन दो (धर्म-धर्मी) को पहले देखा था, उन को वैसे देख रहा हूँ, परन्तु दोनों का विशेष