भारतकोश
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

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६. सू० ] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ८१ एवमुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थाकृते संशये वेदितव्यमिति । यत्पुनरेतत्–‘विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः’ इति ? विप्रतिपत्तिशब्दस्य योऽर्थः– तदध्यवसायो विशेषापेक्षः संशयः, तस्य च समाख्यान्तरेण न निवृत्तिः । समाने- ऽधिकरणे व्याहतार्थौ प्रवादौ विप्रतिपत्तिशब्दस्यार्थः, तदध्यवसायश्च विशेषा- पेक्षः संशयहेतुः । न चास्य सम्प्रतिपत्तिशब्दे समाख्यान्तरे योज्यमाने संशय- हेतुत्वं निवर्तते । तदिदमकृतबुद्धिसम्मोहनमिति ! यत्पुनः ‘अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः’ इति ? संशय- हेतोरर्थस्याप्रतिषेधादव्यवस्थाभ्यनुज्ञानाच्च निमित्तान्तरेण शब्दान्तरकल्पना । व्यर्था शब्दान्तरकल्पना, अव्यवस्था खलु व्यवस्था न भवति; अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वादिति । नानयोरुपलब्ध्यनुपलब्ध्योः सदसद्विषयत्वं विशेषापेक्षं संशयहेतुर्न भवतीति प्रतिषिध्यते, यावता चाव्यवस्थाऽऽत्मनि व्यवस्थिता न इसी नय से 'उपलब्ध्यव्यवस्थाध्यवसायोपपन्न' संशय के बारे में भी पूर्वपक्षी का खण्डन समझ लेना चाहिये । पूर्वपक्षी ने यह जो 'विप्रतिपत्ति में संप्रतिपत्ति' ( २. १. ३ )—इस सूत्र में 'विप्र- तिपत्ति के कारण उसके सम्प्रतिपत्ति होने से यदि विप्रतिपत्ति से भी संशय माना जायेगा तो यह संप्रतिपत्ति से ही संशय मानना होगा' कहा था ? उसका उत्तर है—'विप्रतिपत्ति' इस शब्द का जो अर्थ है वह उसका विशेषधर्म के ज्ञान की अपेक्षा रखता हुआ संशय का हेतु है, उसका 'संप्रतिपत्ति' यह दूसरा नाम कर देने से संशय की निवृत्ति थोड़े हो जायेगी। समान अधिकरण में विरुद्ध अर्थ वाले दो मत ('आत्मा हैं', 'आत्मा नहीं हैं') 'विप्रतिपत्ति' कहलाते हैं, उनका ज्ञान विशेषधर्म ( ज्ञान ) की अपेक्षा रखने से संशय का कारण बनता है । इसकी 'संप्रतिपत्ति' यह अन्य संज्ञा कर देने से संशय की निवृत्ति कैसे हो जायेगी ! इस तरह तो मूर्खों को बहकाया जा सकता है ! यह जो कहा था—'अव्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित होने के कारण अव्य- वस्थोपलब्धि से संशय नहीं हो सकता' ? इसका उत्तर है—पूर्वपक्षी द्वारा संशय के हेतु- भूत अव्यवस्थारूप अर्थ का प्रतिषेध न करने से तथा अव्यवस्था के स्वीकार करने से अन्य निमित्त को लेकर शब्दान्तर की कल्पना की जा रही है, परन्तु यह शब्दान्तरकल्पना व्यर्थ ही होगी; क्योंकि तब भी अव्यवस्था व्यवस्था नहीं बन सकेगी। वह तो 'अव्यवस्था' इस स्वरूपार्थ में ही व्यवस्थित है, नाम भले ही उसका कुछ रख लें। उन दोनों अव्य- वस्थाओं का सत् तथा असत् विषयों में होना विशेषधर्म (के ज्ञान) की अपेक्षा रखता हुआ संशय का कारण होता है—इसलिये ही उनका प्रतिषेध नहीं किया जा रहा है; अपितु न्या० द० ११