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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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विचारशीलताका, जिससे प्रत्येक मनुष्य यह अनुभव कर सकता तथा जान और समझ सकता कि मुझ जैसा सब कुछ ईश्वर प्रदत्त ईश्वर प्रदत्त शक्तिके दुरुपयोग द्वारा मनुष्य पर नियन्त्रण कर सकनेका भ्रम और दम्भ उसके जीवनका विकराल विषाक्तस्वरूप बनकर खड़ा हो जाता है। जिसका परिणाम होता है कि वह दम्भ ही व्यक्तिगत तथा सामाजिक सुख शान्ति तथा सन्तोष और प्रीति प्यार व रस को नष्टभ्रष्टकरके मानव जीवनका सारा स्वाद ही समाप्त कर देता है। इन्सानियत-शून्यता! हर क्षण भय व्याप्त रहेगा विनाशका! विनाशका भय उसका ही संहार कर देता है। इस पर भी मानव यदि उस ईश्वरीय रस और सत्यताको समझ न सके, अथवा उस समझका ही दुरुपयोग कर सन्मार्गके स्थानपर विपथगामी हो जाय तो भाई, जहां चिन्तन समाप्त हुआ, अथवा जो केवल स्वार्थमयी दृष्टिकोण बना कर विचारनेका प्रयत्न मात्र हुआ तथा जिसे मात्र यह स्मरण रहा कि संसार का सब कुछ मेरे भोगका साधन मात्र है और उसके लिए, केवल यह विचार स्वाभाविक और सत्यनिष्ठ मान लिया गया कि, प्रत्येक की चेष्टा सफलताका, पद, धन और वैभवका ही नाम मात्र रह गया। उस सफलता में सत्यता तथा शुद्धताके विचार कितने उपयोगी समझे गये अथवा न समझे जा सके। इस पर विचार करने की अपेक्षा, स्वार्थपरायणता इतनी भयानक हो जाय कि सारा जीवन मात्र स्वार्थका पोषक और विचारहीनताका ही रूप बन जाय तो फिर उस प्रभु प्रदत्त विचार-शक्ति का प्रयोजन ही क्या रह गया, जिसके अभाव मात्र मात्र से, नर का पशुके रूप में रूपान्तरित हो जाना संभव है? विचार शक्ति समाप्त होगी, विचारहीनता जन्म ले लेगी तथा उस विचार हीनता, वासना का ही रूप धारण कर सब कुछ अपने भोगका अंग मान बैठेगी और तब मनुष्य मनुष्यताके स्तरसे गिर कर पशुताके स्तर पर आ कर विचरण करेगा, वासनाओं तथा इच्छाओं का, केवल वह दास--गुलाम बनकर रह जाय इसका क्या उत्तर हो यह बात क्या है, या इसके का रूप क्या है? वासनाओं का दास बन कर, वासनाओं का रूप क्या होगा इसका जो रूप दिखाई देगा वासनाका वह स्वरूप और भयानक रूपान्तरित हो वासनाके ही रूप स्वरूप धारण करेगा। मानव तो केवल विचारहीनता का ही नाम वासनाका होगा या वासनाका ही, केवल वासनाओं का सम्मिश्रण रूप ही यह रूप धारण करेगा क्या, विचार ही वासनाका स्वरूप है, वासनाके वशीभूत होकर मनुष्य जो कुछ कर्म करता अथवा विचार कर बैठता अथवा उस के सब विचार विचारहीनता बनकर रह जायंगे? उस अवस्था को न तो कोई विचारशीलता कह सकेगा? न उस रूप को न मन, बुद्धि तथा न उस कर्म, वचन का रूप, जो वासनाके वशीभूत हो, उस वासनाका स्वरूप होगा? सारा स्वरूप ही वासना! वासनाका जो रूप ही उस रूपमें दिखाई देगा वह विचारहीनता वासनाका ही रूप बन कर खड़ा हो जा कर सारे जीवनका रस समाप्त कर विनाशका ही स्वरूप बना देगा कि नहीं? उस अवस्था में वासना की तृप्तिका भी अन्त हो चुका होगा तथा वासना ही उस समय केवल--एक इच्छा, जिसके लिए न केवल भोग का भाव, वासना, तृष्णा, सब कुछ मिटकर केवल एक विचारहीनताका ही रूप बन कर उस को समाप्त कर देगा? वासना क्या? वासना तो उस अवस्था को वासना भी वासना के रूप में स्वीकार न किया जाय, वासना का जो स्वरूप अपने आप में बन वासना के स्वरूप का विचार ही, वासनाओं का प्रभाव ही सब कुछ समेट समाप्त वासना का केवल रूप, वासना; तृष्णा वासना बन कर नहीं रहसकती, न वह वासना तृष्णाका रूप धारण कर सकती है। जो इस तरह की स्थिति होगी वहां वासना का ही साम्राज्य होगा तथा, उस समय की वासनाका केवल एक ही विकरालरूप भयानक स्वरूप होगा कि जिस अवस्था में मनुष्य अपने विचार की क्षमता को शून्य बनाकर--उस रूपमें जहां इच्छा तथा जो वासना तृष्णाका रूप धारण कर सब कुछ नष्ट कर देगी जिसका स्वरूप होगा, वासना का रूप केवल वासना बनकर, एक मात्र इच्छा तृष्णा वासना बनकर केवल उस सीमा पर्यन्त विचारहीनता को ले जा कर उस शून्य रूप में उस वासनाका जो स्वरूप प्रस्तुत होगा वह, केवल एक वासना मात्र ही सब कुछ बनकर रह जायगी। आज तक के इतिहास में भी हम केवल वासनाके साम्राज्य को ही सब रूपों में विनाशका रूप समझकर विचारते व देखते आये। वासना साम्राज्य रूप धारण करके विनाश, केवल वासना विकराल रूपमें ही विनाश का कारण न होकर उस सीमा तक भी चला गया कि जहां वासना अपने सम्पूर्ण प्रभाव द्वारा केवल अपने स्वरूप को ही भोग कर वासनाके नाश का कारण बनकर अन्त में उस रूपमें शेष रह जायगी जो विचारहीनताका रूप ही बन कर रहेगा, जो उस समय के वासनाके उस रूप द्वारा रूपान्तरित हो! 104