अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयद्यपि यह बात सर्वथा सत्य नहीं मानी जायगी कि वर्तमान काल में जितने भी पन्थ और सम्प्रदाय विद्यमान हैं; उनका जन्म केवल स्वार्थवश ही हुआ होगा। वस्तुतः उनका जन्म मानव-चेतना के जागरण के रूप में ही हुआ होगा। विभिन्न प्रकार के मत-मतान्तरों द्वारा मनुष्य के विभिन्न मनोभावों को सन्तुष्ट होने का अवसर मिला, व्यक्तिगत रूप से भी मानव का अहं तुष्ट हुआ, उसकी विचार-शक्ति का विकास हुआ। यह भी सम्भव है कि तात्कालिक सामाजिक आवश्यकता के अनुसार उनका उदय उपयोगी रहा हो। इस आधार पर यदि इन सम्प्रदायों के जन्म को उपयोगी मान भी लिया जाय, तो भी इनकी वर्तमान उपयोगिता संदिग्ध है। आज इन सम्प्रदायों की उपयोगिता क्या है? क्या ये मानव-कल्याण के साधन हैं? क्या आज का पथभ्रष्ट मनुष्य इनसे कोई प्रकाश ग्रहण कर सकता है? क्या ये मानव को मुक्ति का सन्देश दे सकते हैं? आज सम्प्रदाय के नाम पर मानव का शोषण किया जा रहा है। मानव-कल्याण के नाम पर बने सम्प्रदाय आज मानव के सबसे बड़े शत्रु बन गये हैं। आज सम्प्रदाय और पन्थ सामाजिक वैमनस्य के सबसे बड़े कारण बन चुके हैं। सम्प्रदाय के नाम पर आज मानव-मानव का शत्रु बना हुआ है। क्या यह धर्म है? क्या यह ईश्वर का आदेश है? जिस परमात्मा, ईश्वर, अल्लाह, गॉड अथवा प्रकृति का नाम लेकर यह सब किया जा रहा है! क्या सचमुच? परमात्मा का आदेश सम्प्रदायवाद फैलाना है? क्या परमात्मा सम्प्रदायों के नाम पर मानव का रक्त बहाने का आदेश देता है? ईश्वर को यदि एक माना जाय, तो क्या ईश्वर अपने ही अंश रूपी मानव को इस प्रकार आपस में लड़ाने का काम करेगा? सम्प्रदायवाद आज मानव-समाज के लिए एक ऐसा महारोग बन चुका है; जिसका यदि समय रहते, कोई उचित उपचार न किया गया, तो सम्प्रदाय के नाम पर मानव-समाज का अस्तित्व ही समाप्त हो जायगा, अतः इस रोग का शीघ्र उपचार करना आवश्यक है। क्या मानव सम्प्रदायवाद से मुक्ति पा सकता है? क्या सम्प्रदायवाद का अन्त सम्भव है? क्या मानव सम्प्रदायवाद के चंगुल से मुक्त हो सकता है? क्या यह सम्भव है कि वह बिना सम्प्रदाय के, धार्मिक कहला सके, क्या यह सम्भव है, कि वह धर्म का पालन तो करे किन्तु किसी सम्प्रदाय का अंग न बने! अवश्य ही ऐसा सम्भव है। धर्म का वास्तविक रूप मानव, सम्प्रदाय से परे होकर अपना सकता है। धर्म का मूल स्वरूप सम्प्रदाय से सर्वथा भिन्न है। सम्प्रदाय तो एक बाह्य आवरण है। जिस प्रकार विभिन्न सम्प्रदाय अपने-अपने सिद्धान्तों को विभिन्न ढंग से व्यक्त करते हैं, उसी प्रकार धर्म का कोई बाह्य आवरण नहीं होता, वह आन्तरिक है; सम्प्रदाय परिवर्तनशील है, धर्म अपरिवर्तनशील है; सम्प्रदाय में संकीर्णता होती है, धर्म व्यापक है, धर्म सार्वभौम है। सम्प्रदाय किसी विशेष व्यक्ति या सिद्धान्त से सम्बन्ध रखता है जब कि धर्म का सम्बन्ध किसी व्यक्ति विशेष से न होकर सार्वभौम सत्य से होता है; धर्म सत्य स्वरूप है। सम्प्रदाय का सम्बन्ध तो केवल मानव से है, मनुष्य के आचार-विचार तक ही सीमित है; धर्म का सम्बन्ध समस्त सृष्टि से है। सम्प्रदाय तो धर्म की संकुचित व्याख्या मात्र है, जिसके आधार पर सम्प्रदाय प्रवर्तक, धर्माचार्य अपनी शक्ति का विस्तार करते हैं! सम्प्रदाय संकुचित विचार, संकीर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है! सम्प्रदाय बन्धन है, सम्प्रदाय अन्धविश्वास सिखाता है। धर्म तो मानव को मुक्त करता है। धर्म तो मानव को बन्धन से छुड़ाता है। धर्म का स्वरूप सत्य है। सम्प्रदाय का स्वरूप अन्धविश्वास पर टिका है। धर्म का स्वरूप विवेक पर आधारित है, धर्म में सत्य का दर्शन होता है। धर्म मानव को उदार बनाता है। सम्प्रदाय ने, सम्प्रदायवाद को जन्म दिया है, जिसने मानव समाज को छिन्न-भिन्न कर दिया; मानव को मानव से लड़ाया। सम्प्रदाय ने मानव का विवेक छीन लिया। आज सम्प्रदाय अन्धविश्वास का दूसरा नाम बन चुका है। सम्प्रदाय के नाम पर मानव अन्धविश्वासी बन चुका है। मानव सम्प्रदाय के जाल में इस प्रकार जकड़ा जा चुका है कि वह विवेक से काम लेना भूल चुका है। आज सम्प्रदाय का बोलबाला है; आज मानव सम्प्रदाय के जाल में ऐसा फँसा हुआ है कि सम्प्रदाय के नाम पर वह कुछ भी करने को तत्पर रहता है। सम्प्रदाय ने मानव को संकुचित कर दिया है। सम्प्रदाय के कारण मानव का दृष्टिकोण अत्यन्त संकीर्ण हो चुका है। सम्प्रदाय के कारण मानव का धर्म भ्रष्ट हो चुका है। सम्प्रदाय ने मानव का शोषण किया है। मानव-कल्याण के नाम पर मानव का शोषण, यह कैसा धर्म है? आज सम्प्रदाय के नाम पर मानव का शोषण हो रहा है। सम्प्रदाय ने मानव-समाज को अनेक टुकड़ों में बाँट दिया। इन सम्प्रदायों की आज कोई आवश्यकता नहीं, इनका अन्त ही श्रेयस्कर है। सम्प्रदायों के कारण आज मानवता सिसक रही है; सम्प्रदाय मानव को लड़ाने का काम कर रहे हैं। आज आवश्यकता इस बात की है, कि मानव को इस अन्ध-कूप से बाहर निकाला जाय। आज आवश्यकता इस बात की है; कि धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझा जाय।
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