अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 11, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान् को भोग लगा दिया गया तो वह भोग भगवान् खायेंगे; पत्थर भगवान् को भोग खा, तो वह भोग भगवान् भोगी होगा और भक्त दानी कहलायेगा ? --तो यह बात नहीं है, भोग लगाने से भाव आता है, उस भाव स्वरूप को प्राप्त हो जा! भक्ति द्वारा चेतना आती; भक्ति द्वारा राम, कृष्ण सब का ज्ञान हो जाता अथवा अपने ही रूप का पता चला-ज्ञान प्राप्त हुआ तब पता चला! यह भक्ति-ज्ञान का फल है! जो सब कुछ भूल कर भी भक्ति करता भगवान् उसके सामने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उस साक्षात् हो जाते! केवल भक्तिकारी विचार रखना भी केवल विवेक है; विवेक का प्रकाश जब भक्त के अंतःकरण पर प्रकाशवान् हो जाता तो सब कुछ स्वयं घटित होता देख, विचार बंद हो जाते और तब वह स्वयं अपने स्वरूप आत्मतत्त्व को पाकर, तृप्त हो जाता अथवा यों, या भक्तिकारी विचार करते समय ही सब कुछ अपने भीतर देख तृप्त हो जाता तो भी उस भक्त द्वारा घटित स्वरूप को ही देख अपना स्वरूप शांत हुआ अतएव, सब कुछ यह भक्तिकारी पर ही निर्भर है कि ज्ञान भी उदय हो सकता है... ! पर जब शांत, स्थिर बनेगा, तब शांत तो बनेगा, पर भक्तिभाव की निरंतर धारा बहने लगी तब ही--यह शांत का शांत हो गया जहां शांत शांत ही हो गया अथवा एक रूप स्वरूप बन अथवा निर्गुण निराकार से ही सब अभिव्यक्ति प्रकट हो गई तो शांतस्वरूप ही तो यह सब हो गया तब फिर सगुण साकार द्वारा भी अपनी प्रकृति का प्रकाश परमात्मा से उत्पन्न हुआ देख अचरज मिटता नहीं, परमात्मा स्वयं विश्व रूपी रचना रचकर इस रूप संसार सागर से निर्लेप रहता है; परमात्मा को सब लीला अखंड; प्रकृति रूप का अखंडित ही--भाव-स्वरूप! केवल यह देखना पड़ता है, शांत ही शांत केवल देखने का प्रकाश है, वह सब कुछ केवल देखने से ही सब व्यवस्था स्वयं ही बनी देखकर शांत हो गये, सो ही स्वरूप अवस्था को पाकर वो, केवल ही रहे न, व्यवस्था तो चल रही, पर चलने से ही जो उत्पन्न रूप परमात्मा का शांत स्वरूप था उसे केवल ही देखा सब कुछ शांत स्वरूप स्वयं ही प्रकाश स्वरूप है; प्रकाश सब अपनी अपनी गति से चल रहा दिखाई दे रहा, केवल देखना ही तो हुआ देखना तो स्वयं एक स्वरूप रहा, सो स्वयं स्वरूप ही जब देखना हो अथवा दर्शन करे, परमात्मा सब कुछ देख रहा तो वह स्वयं देखना न कि परमात्मा शांत ही शांत देखना केवल देखना ही तो रहा जब तो देखना भी शांत हुआ जब तक यह अंतःकरण रूपी मन से ही सब कुछ देखा जा सकता रहेगा तब, सब विचार ही! पर केवल शांत मन से जो कुछ देखा जा रहा था उस मन की विशालता ही रही; केवल मनको विशाल ही तो किया गया तब सूक्ष्म हुआ जब यह मन सूक्ष्मता विचार से सब कुछ अपने स्वरूप आत्मतत्त्व विशालता को पाकर उस शांत रूप--? तो सब कुछ देखना भी समाप्त हो, अब सब कुछ देखना शांत मन रूप से ही हो रहा था अब केवल न मन रहा न कुछ और रहा केवल रूप ही सब कुछ दिखाई देने लगा, केवल शांत स्वरूप जहां देखना था देखना, सो ही देखना एक रूप बन गया उस समय जो ज्ञान हुआ केवल केवल स्वरूप सब का आत्मतत्त्व रूपी केवल ही सब प्रकाश अपने स्वरूप को ही जो रूप-रंग दिखाई दे रहा था; सो केवल सब को ही दिखाई देता था; केवल स्वरूप परमात्मा का देखा था, जो अखंडता के द्वारा सब कुछ शांत रहा सो, इस को केवल ही सब घट-घट व्यापी या रोम-रोम व्यापी या अखंड ज्योति प्रकाश स्वरूप सब ही जगह सब जगह व्याप्त ही तो था, सो ही अखंड ही तो अखंड ज्योति थी, जो केवल ही अखंड ज्योति रूप सब को प्राप्त रहा हो गया, सो केवल स्वरूप अखंड ज्योति ही का नाम रहा केवल इस ज्योति रूप रंग-रूप सब का केवल ही सब नाम रहा, सो ही केवल शब्द ही तो अखंड का नाम ही तो परमात्मा स्वरूप का अखंडित--अखंडित स्वरूप ही तो परमात्मा स्वरूप का अखंडित--यह केवल ही तो परमात्मा ज्ञान ही केवल अखंडित केवल ही परमात्मा सब जगह सब ही तो परमात्मा स्वरूप व्यवस्था, केवल अखंडित ज्ञान ही परमात्मा का ही अखंडित स्वरूप ज्ञान व्यवस्था, केवल सब ज्योति का सारा व्यापक अखंड व निर्गुण निराकार स्वरूप अखंड परमात्मा ही 11