अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 183 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यवस्था का भार जिस पुरुष विशेषके अधिकार में हो वह राजा कहावे, प्रजाके सुख दुःख देखना ही जिनका काम हो, प्रजाके रक्षण का जिम्मा, सो सब राजा का काम इत्यादि प्रमाणों से सिद्ध हुआ कि महाराज दशरथ के अधिकार में सब काम ठीक ही था जो उस पर दोष धरे, राजा सब बात में प्रजाके आधीनार्थ न्याय युक्त प्रजागण के सुख हित को ही परम न्याय वा कर्त्तव्य-कर्मनिष्ठ समझ अपनी स्त्री वियोग के दुःखको सहते प्रजाके लिये ऐसा शोक महा-दुःख सह ऐसा कर्तव्यनिष्ठ हुए? सो संक्षेप उत्तर सुनो सो यों है, राजा सब बात में प्रजाके आधीनार्थ न्याय--वा प्रजाका प्रबन्ध तो अवश्य ही, प्रजा हित सर्व कार्य्यार्थ प्रबन्धका काम तो था परन्तु ऐसा तो न था कि जो बात, प्रजा कहे वही सर्वथा स्वीकार्य्य हो, राजा सब बात न्याय, धर्मयुक्त, नीति, कर्म- वाद, विचार, प्रत्यक्ष, सत्य, शास्त्र, प्रमाण, युक्तियों से विचारता था, ऐसा अन्धा धुन मन--मुख ना करता, अविचारित, अन्यायी बातको राजा सर्व प्रजाके ही क्या सब लोक भर के भी मत को मान कर जो काम ना होय वह कदापि नही कर सका राजा ज्ञान, वैराग्यवान् परम धीर, सो काम प्रजाके ही सुख के लिये सर्वथा नही करता जिस काम का फल लोक-परलोक दोनों को दुःख रूपी नरक दायक होने प्रजाका जिस पर केवल भ्रमरूप ही, भय था, जिसका यथार्थ निराकरण राजा और प्रजागणने सब, राजा और प्रजा--के प्रबन्धार्थ प्रजाके ही मन- मत पर छोड़ दिया निष्पाप सीताजीको त्यागने से, सर्व प्रजा सम्बन्धी सब प्रजा मण्डल का काम सब राजा, प्रजा, न्याय, नीतिप्रबन्ध, जो सब था, सब नष्ट भ्रष्टता, अनर्थक सर्व ही हो सकता सिद्ध प्रजाके प्रबन्ध के नियमों से तो यह बात थी, राजा सब प्रजाके आधीनार्थ न्याय का प्रबन्ध तो, उसके प्रत्येक न्याय नीति विषयक कार्य्यों में अवश्य होता परन्तु प्रजा सर्व विषयके अनधिकारिणों के हाथों सब ना छोड़ा जाता है, इसका प्रमाण? यथा राजा को प्रजागणके सब काम करने पड़ते हैं; सब प्रजाके ही तो सब काम हैं, सो भी सब प्रजा कहे, तो भी यह काम नहीं होता कि प्रजा कहे कि चोरी करने पर न दण्ड दिया जावे वा जो जिस पर डाका मारे सो ना तो दिया जा वा सर्व काम सर्व प्रजाके लिये छोड़ दिया, फिर तो सब काम प्रजा ही का बिगड़ कर सब सर्व ही नाश होना सिद्ध होवे सो राजा ऐसा कभी अपने मन नावे सो प्रजाके प्रबन्ध का नियम सब शास्त्र सब न्याय, प्रमाण से, यों रहा सिद्ध हुआ सो यह दूसरा कारण तिस भ्रम भर से जो हुआ सो सब न्याय वा कर्त्तव्य-धर्मनिष्ठा, कार्य्याकार्य्यके वा प्रबन्धके नियमों के सर्वथा विरुद्ध सर्व अन्यायी सिद्ध होता है, जो अज्ञानान्ध सब, भ्रम कार्य्यकारी प्रजा सम्बन्धके बहकावे मात्र सर्व राज नियम ना हो सका विचारता, फिर कर्त्तव्यता कैसी; सब भ्रम त्याग कर सब न मान कर, व अपनी परम कर्त्तव्य-कर्मनिष्ठा बात को ही सर्वथा ही पालन कर सका था। दूसरा यह भी विचारने का बात सिद्ध प्रजाके प्रबन्ध--नियमों से सब प्रजा और प्रजाके प्रबन्ध--नियमों के आधीन सर्व प्रजा कार्य्य सम्बन्ध सम्बन्धी पुरुष, केवल व्यवस्था प्रबन्ध के नियमों से ही आधीन सब प्रबन्ध सम्बन्धी हो कर, सदा सब व्यवस्था सब काम में, प्रजा परस्पर मिल कर अपने प्रबन्ध कार्य्य सब वा व्यवस्था-सम्बन्धी सब काम को कराती, प्रजा को ही आज्ञा सब पर ही सदा प्रबन्ध सम्बन्धी सब, परस्पर सब, प्रबन्ध सम्बन्धी सर्व पर, ही ही प्रजाका सब पर हाथ रहता वा प्रबन्ध--नियमों की आज्ञा प्रजा ऊपर सब काम सब प्रजा करती सब थी, उस सब बात को छोड़कर, इस बात सबही ना बात का सर्व काम प्रजा जन-वर्ग के आधीन तो ना था कि केवल १ प्रजावर्ग की बात पर ही राजा सब काम करने उद्यत वा प्रबन्ध का कर्त्ता सो सब बात भी भ्रम भर, वा धोखे का काम रहा, सब न्याय वा नीति से परे रहा, ना तो सब प्रमाण सिद्ध; ना तो कोई न्याय; सब बात सर्वथा अशुद्ध; 111