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अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (उद्गम)

DevanagariHindipublished183 पृष्ठ

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इस प्रकार सभी आश्चर्यचकित होकर, परस्पर बोले, अवश्य देखकर, यह गणेश, प्रथम पूजनीय देव ही हो यह प्रकट हुए, जो मनुष्य इन को न प्रथम पूजे, विघ्नेश्वरदेव उसे, ऐसा स्वरूप कर देते फिर कभी मनुष्य स्वरूप नहीं पाते; ऐसा जान सभी गणेश जी के पाद पद्म सिर नवाकर और सब जगत्पति जगदाधार ब्रह्मा विष्णु आदि देवता दोनों कर जोड़े हाथियों सहित उस हाथी स्वरूपधारी को विनय करने लगे, हे देव जगत् के जो विघ्नकर्ता अथवा जो जो स्वरूप धारण किया सोई तुम्हारा रूप सर्वविदित सब को भय नाशक हुआ, सो सो स्वरूप तुम्हारा पूजें; तुम्हारी जो पूजा निष्काम मन करके विघ्न नाश हेतु से करे अथवा सकाम अपने मन की मनोकामना को शीघ्र पावे; ऐसा कह सब अपने अपने धाम को गये। द्वितीय अध्याय में यह कथा विस्तार से कही गई कि पार्वती गणेशजी सहित, स्नान करने को गई गंगाजी के तट बैठकर विचारने लगीं कि गणेशजी जब तक गृह पर रहे किसी को भय नहीं हुआ जब से यह कैलाश पर्वत पर आये सब को भय व भ्रम का विस्तार बना सो कुछ न कुछ उपाय ढूंढना योग्य है जो भय निवारण हो, यह विचार के गंगाजी तट पर महादेवालय से जल ला कर पूजा की, स्नान उपरान्त उस जल वस्त्र व अंगों का मैल धो डाला, गंगा जी के तट पर जो पुतला बनाया सो केवल पुतला रूप ही न देखकर दो नेत्रों से विचारने लगे कि ऐसा रूप किसी का कभी नहीं देखा जिसने त्रिलोकी को मोहित किया; इसमें प्राणदान देकर कौन कष्ट को न पावेगा सो तो जल ही में बहाना योग्य विचारकर गंगा में फैंक दिया, गंगा स्वरूप से उत्पन्न हुआ जल में से न निकला, गंगा पार्वती का विचार दोनों के मनन करने से दोनों का एक पुत्र उत्पन्न हुआ सो सब जीव भक्षण करने लगा सो जो जो उस स्वरूप को जो जो पुकारते, सब को गंगा पुत्र ही कह कर पुकारते रहे सो यह न कहकर कि गणेशजी का रूप सब को यह है? सब के स्वरूप से उत्पन्न हुआ दोनों के दो नाम कर सब को इस सब बात विदित हुई, दो नाम एक व नाम सब भिन्न-भिन्न स्वरूप नाम भिन्न-भिन्न होने पर गणेशजी कहलाये सो, भिन्न-भिन्न स्वरूप धारे अनेक प्रकार कथन किया, विनायक स्वरूप सब के मनोरथों को पूर्ण करने का रूप बताया यह सब स्वरूप दोनों ने देखा सो सत्य माना; फिर सब विघ्न निवारण करने पर दो ही नाम रहे एक द्वै-मातु कहलाये जो सब पर कृपा करने, विनायक सो जो विघ्न को दूर करते हैं, सो विचारकर सब देवता लोग, जो जो नाम जिसे रुचिकर हुआ पुकारे? सो शिव पार्वती ने सब रूप को देख व दो स्वरूप मान सब विघ्न नाश कर सब कुछ दिया ऐसा जानकर विचारते, सब उस स्वरूप को नमस्कार करते हुए सब सुख पाये सो गणेशजी दोनों स्वरूप धारे सो इस प्रकार सब सब को दो रूप से सब को सहायता करते--तो सब देवताओं ने एक द्वैमातुर नाम धर उत्सव के साथ शिव गणों सहित सब रूप पूजा की।

इति द्वितीय अध्याय

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